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संपादकीय: नक्सली नासूर

छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियों पर काबू न पाए जा सकने के पीछे कुछ वजहें स्पष्ट हैं। छिपी बात नहीं है कि वहां नक्सली समूह स्थानीय लोगों के समर्थन के बिना लंबे समय तक नहीं टिक सकते। इसलिए इस समर्थन को समाप्त करने की जरूरत पर शुरू से बल दिया जाता रहा है।

Author Published on: March 23, 2020 11:59 PM
नक्सली हमले के बाद जंगल में लापता जवानों की खोज। (फाइल फोटो- Indian Express)

छत्तीसगढ़ के सुकमा में सुरक्षाबलों पर नक्सली हमले से एक बार फिर इस समस्या से पार पाने की चुनौती रेखांकित हुई है। वहां नक्सली समूह लंबे समय से सक्रिय हैं और उन पर काबू पाने में सरकार के प्रयास प्रश्नांकित होते रहे हैं। अक्सर नक्सली वहां घात लगा कर या फिर सीधे मुठभेड़ में सुरक्षाबलों को चुनौती देते हैं। इससे पार पाने के लिए राज्य सरकार और केंद्र के संयुक्त प्रयास चलते रहे हैं, पर इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई है। अक्सर देखा जाता है कि खुफिया तंत्र और सुरक्षाबलों की तैयारी विफल साबित होती है। सुकमा में ताजा नक्सली हमला इसका एक और उदाहरण है।

शनिवार को जब सुरक्षाबलों को जानकारी मिली कि सुकमा जिले के एलमागुड़ा में नक्सली गतिविधियां सक्रिय हैं, तो विभिन्न बटालियनों के करीब छह सौ जवान वहां रवाना कर दिए गए। मगर करीब ढाई सौ की संख्या में नक्सलियों ने उन पर हमला कर दिया। इसमें सत्रह जवान मारे गए और करीब पंद्रह गंभीर रूप से घायल हो गए। मारे गए जवानों के शवों को घने जंगल से रविवार को ही तलाश कर निकाला जा सका। इस घटना ने एक बार फिर इस चिंता को गाढ़ा किया है कि नक्सली समस्या पर काबू पाने के लिए सुरक्षबलों की तैयारियों को कैसे अधिक चाक-चौबंद किया जाए।

छत्तीसगढ़ में नक्सली समूह जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार के मुद्दे पर लगातार संघर्ष करते रहे हैं। इस संबंध में कई बार सरकार की तरफ से उनसे बातचीत के प्रयास भी हुए। केंद्र ने वनभूमि पर आदिवासियों के मालिकाना हक को लेकर पुराने कानून में संशोधन किया और कंपनियों द्वारा उनकी अधिग्रहीत भूमि वापस लौटाने का अभियान चला। मगर अब भी नक्सली गतिविधियां नहीं रुक रही हैं, तो इस मामले में नए सिरे से रणनीति बनाने की दरकार स्वाभाविक है। पहले आरोप लगता रहा कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सली समूहों से संवाद स्थापित करने में नाकाम रही है।

पर अब वहां सरकार बदली है और उसका दावा है कि उसने आदिवासी समूहों के हितों के लिए काफी व्यावहारिक कदम उठाए हैं, इससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव भी आया है। मगर यह नक्सली हमला सरकार के ऐसे तमाम दावों और विज्ञापनों आदि के जरिए प्रचारों पर सवाल खड़े करता है। अगर सचमुच सरकार के प्रयासों से आदिवासी समूह और नक्सली संतुष्ट होते तो शायद इस तरह के संघर्ष की नौबत न आती।

छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियों पर काबू न पाए जा सकने के पीछे कुछ वजहें स्पष्ट हैं। छिपी बात नहीं है कि वहां नक्सली समूह स्थानीय लोगों के समर्थन के बिना लंबे समय तक नहीं टिक सकते। इसलिए इस समर्थन को समाप्त करने की जरूरत पर शुरू से बल दिया जाता रहा है। मगर इसके लिए पहले स्थानीय आदिवासियों को नक्सलियों के विरुद्ध सेना की तरह तैयार करने का प्रयास हुआ, जिसकी प्रतिक्रिया काफी उग्र रूप में हुई। फिर स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच संवाद का जो सेतु कायम किया जाना चाहिए था, वह अभी तक ठीक से नहीं बन पाया है।

स्थानीय लोगों का प्रशासन पर विश्वास बहुत जरूरी है। इसी से सूचना तंत्र को पुख्ता बनाया जा सकता है। अगर स्थानीय स्तर पर खुफिया एजेंसियों और सुरक्षाबलों का सूचना तंत्र कारगर होता, तो नक्सलियों की साजिशों का समय पर पर्दाफाश होता और उन्हें मिलने वाली मदद, साजो-सामान को रोकने में कामयाबी मिल सकती थी। जबकि नक्सली इस मामले में अभी आगे देखे जा रहे हैं। जब तक सरकारें इन कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने का प्रयास नहीं करेंगी, इस समस्या पर काबू पाना कठिन ही बना रहेगा।

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