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नक्सली कहर

पिछले 11 मार्च को हुए एक हमले में सीआरपीएफ के बारह जवान शहीद हुए थे।

Author April 26, 2017 4:10 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

यह सात साल में नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला था। सोमवार को छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुए इस हमले में सीआरपीएफ के पच्चीस जवान शहीद हो गए। आधा दर्जन जवान गंभीर रूप से घायल हैं। एक कमांडर समेत सात जवान गायब हैं। इसी इलाके में पिछले 11 मार्च को हुए एक हमले में सीआरपीएफ के बारह जवान शहीद हुए थे। इससे पहले, नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला 2010 में हुआ था, जिसमें सीआरपीएफ को अपने छिहत्तर जवानों को खोना पड़ा। देश में नक्सली हिंसा का इतिहास आधी शताब्दी से भी ज्यादा पुराना है। लेकिन इस समस्या का फिलहाल कोई समाधान होता नहीं दिखता। छत्तीसगढ़ की गिनती नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में होती है। छत्तीसगढ़ को नक्सली हिंसा से निजात दिलाने के लिए यहां बरसों से अर्धसैनिक बलों की निरंतर तैनाती रही है। यहां सलवा जुडूम जैसे प्रयोग भी हुए। पर इस सब के बावजूद नक्सली न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि वे अब भी बड़ी वारदात को अंजाम देने में सक्षम हैं। 74वीं बटालियन के करीब नब्बे जवानों पर दिन के बारह बजे हमला तब हुआ, जब वे खाना खाने की तैयारी कर रहे थे।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने भी एलान किया है कि वे लड़ाई में पीछे नहीं हटेंगे। इससे समझा जा सकता है कि अब शायद नए तरीके से कोई रणनीति बने। सीआरपीएफ के पास अभी तक अपना हवाई-तंत्र नहीं है, इस कारण कई बार घायल जवानों को अस्पताल तक पहुंचाने में भी देरी हो जाती है। नक्सल समस्या को लेकर राजनेता, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और मानवाधिकारवादी लंबे समय से विचार-विमर्श करते रहे हैं। किसी ने इसे कानून-व्यवस्था का मामला बताया तो किसी ने राजनीतिक समाधान निकालने का आग्रह रखा। कई विद्वानों ने इसे सरकारी नीतियों की विफलता और सामाजिक समस्या के रूप में चिह्नित किया। मगर दुर्भाग्य यह है कि हजारों जानें जा चुकी हैं, और यह त्रासद क्रम अब भी जारी है। नक्सल समस्या नासूर बन चुकी है। सलवा जुड़ूम और नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के दूसरे तमाम प्रयास विफल हो चुके हैं। समाधान के नाम पर सरकारें सीआरपीएफ की बटालियनें बढ़ा देती हैं, लेकिन सिर्फ तैनाती बढ़ाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह यह है कि नक्सली अपनी सक्रियता वाले इलाके के चप्पे-चप्पे को जानते हैं। वे जंगली और पहाड़ी इलाकों में अपने अड््डे बनाते हैं।

साफ है कि इलाके के दुर्गम होने का लाभ उन्हें मिलता है। अपनी सक्रियता वाले इलाके में वे आवाजाही तथा संवाद के साधनों को नष्ट करने की फिराक में रहते हैं। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि सुकमा में नक्सलियों ने सड़क निर्माण के लिए सुरक्षा-कवच की तरह तैनात जवानों को निशाना बनाया। नक्सली अक्सर घात लगा कर हमले करते हैं, जैसा कि इस बार भी हुआ। अर्धसैनिक बल के जवान स्थानीय भूगोल से भी नावाकिफ होते हैं और स्थानीय भाषा से भी। स्थानीय स्तर पर रही कमी पुलिस ही दूर कर सकती है। पर अक्सर पुलिस की छवि ऐसी नहीं होती कि वह ग्रामीणों या आदिवासियों का भरोसा अर्जित कर पाए। स्थानीय लोग अमूमन पुलिस से खौफ खाते हैं और दूर भागते हैं। जाहिर है, नक्सली समस्या से निपटने के लिए भी पुलिस सुधार एक अनिवार्य तकाजा है।

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