ताज़ा खबर
 

स्वामित्व और सियासत

नेशनल हेरल्ड के स्वामित्व मामले में दिल्ली की एक अदालत द्वारा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य पांच नेताओं के खिलाफ जारी समन को लेकर जिस तरह कांग्रेस ने संसद में शोर मचाया उसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता..

Author नई दिल्ली | December 9, 2015 10:43 PM
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष हुल गांधी।

नेशनल हेरल्ड के स्वामित्व मामले में दिल्ली की एक अदालत द्वारा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य पांच नेताओं के खिलाफ जारी समन को लेकर जिस तरह कांग्रेस ने संसद में शोर मचाया उसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस की दलील है कि नरेंद्र मोदी सरकार कांग्रेस पर दुर्भावनापूर्ण हमले कर रही है। इसे लेकर कांग्रेसी सांसदों ने दो दिन लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही में बाधा डालने का प्रयास किया। उनके हंगामे के चलते बुधवार को सदन का कामकाज स्थगित करना पड़ा। यह समझना मुश्किल है कि जब मामला अदालत में है, इस महीने की उन्नीस तारीख को उस पर सुनवाई मुकर्रर है, तो कांग्रेस के नेता बीच में उसे अलग मोड़ देने का प्रयास क्यों कर रहे हैं। क्या इसलिए कि नेशनल हेरल्ड के स्वामित्व को लेकर हुई धोखाधड़ी से जुड़े मामले को एक भाजपा नेता ने अदालत में उठाया, इसलिए भाजपा पर आरोप लगाना उसे आसान नजर आ रहा है! अगर यह मामला सचमुच बेबुनियाद है और स्वामित्व हस्तांतरण संबंधी प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी तरीके से संपन्न हुई है तो कांग्रेस को इस तरह उत्तेजित होने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। नेशनल हेरल्ड शुरू से कांग्रेस का मुखपत्र माना जाता रहा है, उसकी स्थापना जवाहरलाल नेहरू ने की थी। मगर वित्तीय संकट के दौर से गुजरने की वजह से करीब सात साल पहले उसे बंद कर दिया गया था। उस कंपनी पर नब्बे करोड़ रुपए की देनदारी थी। उसके बंद होने के दो साल बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत कांग्रेस के पांच अन्य नेताओं ने एक नई कंपनी बना कर नेशनल हेरल्ड का स्वामित्व हस्तांतरित कर लिया। उसकी देनदारियां चुकाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने नब्बे करोड़ रुपए कर्ज के रूप में हस्तांरित किए, जो बाद में माफ कर दिए गए। इस तरह कंपनी के हस्तांरण की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी गई।

अब कांग्रेस भले अपने बचाव में भाजपा पर दुर्भावना का आरोप लगा रही है, पर कुछ सवाल अनुत्तरित हैं, जिनका जवाब दिए बिना सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी बरी नहीं माने जा सकते। अदालत ने भी यही जानने के मकसद से नई कंपनी के सभी शेयरधारकों को उपस्थित होने का नोटिस भेजा है। अगर यह मामला सचमुच बेबुनियाद होता तो उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के कदम को उचित न ठहराया होता। पहली बात तो यही कि कांग्रेस पार्टी ने आम लोगों से जुटाए चंदे को किस हैसियत से अपने ही अध्यक्ष की एक कंपनी को कर्ज के रूप में दे दिया और फिर उसे माफ कर दिया गया? जाहिर है, नेशनल हेरल्ड से कांग्रेस का भावनात्मक जुड़ाव है, पर उसने इस तरह एक व्यावसायिक कंपनी को पैसे किस अधिकार के साथ हस्तांतरित किए? फिर यह भी कि पचास लाख रुपए हैसियत वाली एक कंपनी को दो हजार करोड़ की संपत्ति वाली एक कंपनी का स्वामित्व किस तरह हस्तांतरित कर दिया गया? अगर कांग्रेस के पास इन सवालों का संतोषजनक जवाब है और उसने कानूनन सही प्रक्रिया अपनाई है, तो आखिर उसे अदालत के समक्ष अपनी दलीलें देने के बजाय संसद में इसे निपटाने की क्यों जरूरत पड़ रही है! इस तरह संसद में शोर मचाना एक तरह से अदालत की कार्यवाही में दखल देने का मामला भी बनता है। फिर कांग्रेस को अगर सचमुच कानून पर भरोसा है, लोकतांत्रिक मूल्यों पर यकीन है तो उसका इस तरह उत्तेजित होना जायज नहीं कहा जा सकता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App