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संपादकीय: रिहाई और उम्मीदें

फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की राजनीति के सबसे पुराने नेता हैं। वर्तमान में वे श्रीनगर से लोकसभा के सांसद हैं। कई बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, 2009 से 2014 तक केंद्र में भी मंत्री रहे। जाहिर है, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उनकी गहरी पैठ है, लोगों के बीच व्यापक जनाधार है।

नेकां अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने अपने बेटे उमर अब्दुल्ला से श्रीनगर में मुलाकात की। (एक्सप्रेस फोटो: शुएब मसूदी)

जम्मू-कश्मीर प्रदेश शासन ने नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता और सांसद फारूक अब्दुल्ला को रिहा करके यह सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है कि राज्य में जैसे-जैसे हालात सामान्य होते जाएंगे, वह और नेताओं की रिहाई के बारे में भी विचार कर सकती है। पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट देने के साथ ही सरकार ने राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों- फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को नजरबंद कर दिया था। तब सरकार और प्रशासन का कहना था कि हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए इन लोगों को हिरासत में लिया गया है और जब हालात सामान्य होने लगेंगे, इनकी रिहाई पर विचार होगा। फारूक अब्दुल्ला की रिहाई का फैसला चौंकाने वाला इसलिए है कि हाल तक सरकार की ओर से ऐसे कोई संकेत नहीं थे कि वह राज्य के शीर्ष और ताकतवर नेताओं की रिहाई के बारे में सोच भी रही है। फारूक अब्दुल्ला को रिहा कर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि किसी भी नेता को बदले की भावना से हिरासत में रखने का उसका कोई इरादा नहीं रहा।

फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की राजनीति के सबसे पुराने नेता हैं। वर्तमान में वे श्रीनगर से लोकसभा के सांसद हैं। कई बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, 2009 से 2014 तक केंद्र में भी मंत्री रहे। जाहिर है, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उनकी गहरी पैठ है, लोगों के बीच व्यापक जनाधार है। जम्मू-कश्मीर में इस वक्त जितने भी नेता हिरासत में हैं, वे अनुच्छेद 370 को खत्म करने के प्रबल विरोधी हैं। इसीलिए केंद्र ने पिछले साल अगस्त में जब अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी का फैसला करने से पहले इस बात को भांप लिया था कि इन नेताओं को अंदर किए बिना इस फैसले को लागू करना भारी पड़ सकता है। इसमें कोई संदेह भी नहीं कि पूरी घाटी को छावनी में बदले बिना सरकार इस दिशा में कोई कदम बढ़ा भी नहीं सकती थी।

सरकार को डर था कि अनुच्छेद 370 को लेकर ये नेता घाटी में आंदोलन करेंगे, विरोध-प्रदर्शन करेंगे और नौजवानों को भड़का सकते हैं और इससे जो हिंसा भड़केगी, वह उसके लिए भारी पड़ सकती है। इसलिए सबसे पहले घाटी की मुसलिम आबादी में दबदबा रखने वाले नेताओं को अंदर किया गया। हालांकि सरकार का यह कदम कितना उचित और लोकतांत्रिक था, यह विवाद का विषय है और सरकार को इसके लिए आलोचनाएं भी सुननी पड़ी हैं। बिना किसी आरोप के हिरासत में लेना और फिर जन सुरक्षा कानून की आड़ लेकर बंद कर देने जैसे फैसले पर सरकार को विपक्ष घेरता रहा है।

इसमें कोई संशय नहीं कि घाटी में लोगों को कई महीनों तक पीड़ादायक दौर से गुजरना पड़ा है। फोन और इंटरनेट सेवाएं लंबे समय तक बंद रहीं, जिन्हें कुछ समय पहले ही बहाल किया गया है। घाटी में अब राजनीतिक माहौल क्या और कैसा होगा, इसके बारे में अभी निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। घाटी में पांच मार्च से पंचायत चुनाव होने थे, लेकिन पिछले महीने ही इन्हें अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया। मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का कहना था कि पहले उनके नेताओं को रिहा किया जाए, उसके बाद ही वे इसमें हिस्सा लेंगे। हालांकि अब देखने की बात यह है कि फारूक अब्दुल्ला किस दिशा में बढ़ते हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि जब तक उमर और महबूबा मुफ्ती सहित अन्य नेताओं की रिहाई नहीं हो जाती तब तक वे अपने पत्ते नहीं खोलेंगे। जो हो, घाटी में हालात सामान्य बनाने के लिए सबसे जरूरी तो यह है कि सरकार और सभी विपक्षी दल टकराव का रास्ता छोड़ें और घाटी के सुनहरे भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाएं।

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