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नर्मदा की सुध

म ध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देर से ही सही, नर्मदा की सफाई की पहल की है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनी तमाम समितियां दो कमजोरियों का शिकार रही हैं। एक तो उनकी काहिली है। दूसरे, नियम-कायदों के निजी तौर पर होने वाले उल्लंघनों के खिलाफ वे जब-तब भले कुछ कार्रवाई करती हों, मगर वे […]

Author April 29, 2015 9:21 AM

म ध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देर से ही सही, नर्मदा की सफाई की पहल की है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनी तमाम समितियां दो कमजोरियों का शिकार रही हैं। एक तो उनकी काहिली है। दूसरे, नियम-कायदों के निजी तौर पर होने वाले उल्लंघनों के खिलाफ वे जब-तब भले कुछ कार्रवाई करती हों, मगर वे न तो नीतियों में बदलाव ला सकती हैं न सरकारी विभागों के रवैए में। इसलिए अक्सर वे पाती हैं कि उनके हाथ काफी हद तक बंधे हुए हैं। प्रदूषण की समस्या के मद््देनजर कोई ठोस कदम उठाया जाना अमूमन तभी संभव हो पाता है जब सरकार इस दिशा में कोई फैसला करे या अदालत निर्देश दे। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इसका अपवाद नहीं है। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए नर्मदा का प्रदूषण रोकने का आदेश मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने दिया था। लिहाजा, बोर्ड की नींद टूटी है। अमरकंटक से लेकर खंभात की खाड़ी तक तेरह सौ बारह किलोमीटर के लंबे प्रवाह में नर्मदा अस्सी फीसद मध्यप्रदेश से होकर बहती है। इसलिए यह उचित राज्य की जीवनदायिनी नदी कही जाती है।

अपनी इकतालीस सहायक नदियों के साथ करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने वाली और करीब एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई करने वाली नर्मदा के साथ लोगों की धार्मिक आस्था भी जुड़ी है। इसके बावजूद नर्मदा में सीवर की गंदगी लंबे समय से बहाई जाती रही है। इस नदी में यों तो कई जगह औद्योगिक कचरा भी गिरता है, पर औद्योगिक प्रदूषण के बजाय गंदे नाले और सीवर नर्मदा के प्रदूषण के ज्यादा बड़े स्रोत रहे हैं।

जाहिर है, इसके लिए राज्य-शासन से लेकर नगर निकायों तक सभी की जवाबदेही बनती है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दस मई से नर्मदा के किनारे बसे शहरों और कस्बों का सर्वे करेगा, जिसमें पता लगाया जाएगा कि कहां-कहां सीवर की गंदगी इस नदी में डाली जाती है, और फिर इसे बंद करने को कहा जाएगा। इस अभियान के पूरा होने की कोई समय-सीमा तय नहीं है, पर इसे तत्परता से किया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी कही जाने वाली इस नदी के साथ एक और बड़ी समस्या रही है। इसके किनारों पर धड़ल्ले से अतिक्रमण और अवैध निर्माण होते रहे हैं। इनमें बिल्डरों, डेवलपरों, स्थानीय दबंगों और राजनीतिकों से लेकर धार्मिक संगठन तक शामिल हैं। जबकि मास्टर प्लान में नदी के दोनों तटों पर तीन सौ मीटर तक हर तरह का निर्माण-कार्य प्रतिबंधित किया गया था।

यह प्रतिबंध कागजी बन कर क्यों रह गया? इसलिए कि निहित स्वार्थों के दबाव में इसे लागू करने की इच्छाशक्ति सरकार और नगर निकाय नहीं दिखा पाए। अगर अदालत का निर्देश नहीं होता, तो प्रदूषण-विरोधी कार्रवाई की शुरुआत शायद अब भी न हो पाती। लेकिन यह अभियान आधा-अधूरा क्यों चले?

नर्मदा में सीवर की गंदगी गिरने का सिलसिला बंद करने के साथ ही उसे तमाम तरह के अतिक्रमण से भी मुक्ति मिलनी चाहिए। पर यह काम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बस का नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार और वहां के नगर निकाय ही इसे अंजाम दे सकते हैं। क्या वे इसका हौसला दिखाएंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नमामि गंगे नाम से गंगा के निर्मलीकरण की एक महत्त्वाकांक्षी योजना शुरू की है। पर गंगा ही क्यों, देश की सभी नदियों को प्रदूषण से बचाने की योजना बननी चाहिए।

 

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