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अप्रत्याशित मुकाम

विदेश यात्रा के दौरान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम पूर्व-निर्धारित रहते हैं। इसलिए काबुल से दिल्ली लौटते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अचानक पाकिस्तान पहुंच जाना एक बहुत चौंकाने वाली घटना थी।

Author नई दिल्ली | Updated: December 26, 2015 1:52 AM
लाहौर हवाई अड्डे पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने भारतीय समकक्ष नरेंद्र मोदी का स्वागत किया।

विदेश यात्रा के दौरान किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम पूर्व-निर्धारित रहते हैं। इसलिए काबुल से दिल्ली लौटते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अचानक पाकिस्तान पहुंच जाना एक बहुत चौंकाने वाली घटना थी। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पड़ोसी होते हुए जिस देश का दौरा नहीं किया, वहां मोदी का जाना भारतीय विदेश नीति की एक ऐतिहासिक घटना कही जा सकती है। पर वे जिस तरह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के बगैर वहां जा पहुंचे वह कूटनीति के तमाम जानकारों के लिए भी हैरानी का विषय था। यह शायद मोदी का अपना अनोखा अंदाज है। वे पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने में अपनी असाधारण दिलचस्पी का इजहार करना चाहते रहे होंगे।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी उत्साह दिखाया। लाहौर के अल्लामा इकबाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मोदी की अगवानी में शरीफ के अलावा उनके भाई और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ भी मौजूद थे। मोदी इसके बाद नवाज शरीफ के साथ उनके घर गए। करीब डेढ़ घंटे के इस मिलन का जिक्र भारत-पाक रिश्तों में हमेशा एक अद्भुत घटना के तौर पर किया जाएगा। कुछ लोगों को इसमें अतिरंजना दिखेगी तो कुछ को कई बार अप्रत्याशित कदम उठाने की मोदी की विशिष्ट शैली।

विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर कहा कि पड़ोसियों के बीच रिश्ता ऐसा होना चाहिए। पर क्या पाकिस्तान से हमारे रिश्ते सचमुच ऐसे रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री इतनी बेतकल्लुफी दिखाएं कि सारे प्रोटोकॉल धरे के धरे रह जाएं! पाकिस्तान से भारत के रिश्तों का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव का रहा है। कई बार बेहद खटास भरा भी। फिर मोदी सरकार के दौरान तो तनाव उभरने की नौबत जल्दी ही आ गई। गौरतलब है कि पिछले साल सरकार ने पाकिस्तान के साथ होने वाली विदेशसचिव स्तरीय वार्ता रद्द कर दी थी। फिर इस साल अगस्त में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक स्थगित हो गई, तो उसके पीछे वजह आतंकवाद तथा संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन की घटनाओं को लेकर भारत की नाराजगी ही थी। फिर क्या हुआ कि भारत सरकार का रवैया एकदम बदला हुआ लग रहा है?

पाकिस्तान से संबंध सुधार के संकेत पिछले महीने सामने आए, जब पेरिस के जलवायु सम्मेलन के दौरान कुछ देर के लिए मोदी और नवाज शरीफ मिले थे। फिर इस महीने के शुरू में दो घटनाओं से इसकी पुष्टि भी हो गई। एक तो दोनों तरफ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैंकाक में हुई बैठक और उनके साझा बयान से; और दूसरे, विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के इस्लामाबाद दौरे से। मोदी सरकार के अनेक मंत्री कई बाद यह दोहरा चुके हैं कि पाकिस्तान से बातचीत होगी भी, तो केवल आतंकवाद के मसले पर। पर अब समग्र वार्ता का दरवाजा खुल गया है।

26/11 के आरोपियों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही को तार्किक परिणति तक पहुंचाने समेत आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई, सियाचिन, सर क्रीक, वुल्लर बराज, तुलबुल नौवहन परियोजना, आर्थिक और व्यापारिक सहयोग, मादक पदार्थों की तस्करी पर नियंत्रण, जनता के स्तर पर संपर्क और धार्मिक पर्यटन की सहूलियतें बढ़ाने जैसे तमाम मुद््दे संभावित बातचीत के एजेंडे में होंगे। इसे व्यापक द्विपक्षीय संवाद का नाम दिया गया है, पर यह महज शाब्दिक परिवर्तन है। असल में यह समग्र वार्ता की बहाली ही है। पाकिस्तान से बातचीत जरूर होनी चाहिए, पर विदेश नीति के इतने अहम मामले में घोर विरोधाभासी व्यवहार क्यों?

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