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नरेंद्र मोदी की यूएई सफर का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा इस मायने में ज्यादा अहम है कि भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा के मोर्चे पर घनिष्ठ संबंधों के बावजूद विदेश नीति और कूटनीति के स्तर पर दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से खामोशी छाई हुई थी।
Author August 18, 2015 08:36 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा इस मायने में ज्यादा अहम है कि भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा के मोर्चे पर घनिष्ठ संबंधों के बावजूद विदेश नीति और कूटनीति के स्तर पर दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से खामोशी छाई हुई थी। (फोटो: एपी)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा इस मायने में ज्यादा अहम है कि भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा के मोर्चे पर घनिष्ठ संबंधों के बावजूद विदेश नीति और कूटनीति के स्तर पर दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से खामोशी छाई हुई थी।

अपनी इस यात्रा से प्रधानमंत्री ने भारत के साथ यूएई के संबंधों में थोड़ी गरमाहट लाने की कोशिश की है। करीब साढ़े तीन दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब यूएई की यात्रा की थी तब से वैश्विक परिदृश्य और राजनीति में काफी बदलाव आ चुका है। आज भारत यूएई के साथ तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और राजनीतिक लिहाज से भी दोनों देश पुराने मित्र हैं।

मोदी की यात्रा दोनों देशों के बीच लंबे समय तक बनी रही जड़ता को तोड़ने में मददगार साबित हुई। उन्होंने वहां निवेशकों को आमंत्रित करने के खयाल से कहा कि भारत में अभी एक हजार अरब डॉलर के निवेश की संभावनाएं हैं और सरकार इस देश के कारोबारियों की चिंता दूर करने के लिए जल्दी ही पहल करेगी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार को विरासत में कुछ समस्याएं मिली हैं और उनकी प्राथमिकता पूर्व सरकारों के ‘अनिर्णय’ और ‘सुस्ती’ के चलते कायम ठहराव को खत्म करके उसे गति देना है।

जाहिर है, चौंतीस सालों की ‘कमी’ को दूर करने के बहाने उन्होंने इस मौके पर जहां द्विपक्षीय कारोबारी संबंधों में ताजगी लाने की कोशिश की, वहीं पूर्ववर्ती सरकारों पर तंज भी कसा। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी देश के दौरे पर उन्होंने पहले की सरकारों और परोक्ष रूप से कांग्रेस पार्टी को कठघरे में खड़ा किया हो।

पिछले दो-ढाई दशक के दौरान दुनिया के कारोबारी पटल परभारत ने तेजी से अपनी जगह बनाई है। तमाम विकसित देश निवेश के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। मौजूदा कारोबारी संबंधों के अलावा यूएई के निवेशकों के लिए भी यहां आधारभूत संरचना, ऊर्जा और रियल एस्टेट के अलावा, शीतगृहों और भंडारगृहों के मामले में भी भारी संभावनाएं हैं। भारत को गैस और तेल की जरूरत है और इस क्षेत्र में यूएई भारत का एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी और आपूर्तिकर्ता रहा है।

इस मामले में उसकी भागीदारी बढ़ाना भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। फिर, यूएई में छब्बीस लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं जो हर साल देश को बारह अरब डॉलर की बड़ी रकम भेजते हैं। जहां यूएई की अर्थव्यवस्था में भारतीयों की इतनी बड़ी भागीदारी है, वहीं उन्हें काम और रोजमर्रा के कठिन हालात से जूझना पड़ता है। दलालों की धोखेबाजी के शिकार प्रवासी मजदूरों की समस्याएं गहरी हैं और इन्हें दूर करना एक बड़ा तकाजा है।

यूएई के साथ पहले से बने रहे सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना खासकर आतंकवाद से निपटने के लिए खासा अहम है। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने वहां दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी और ऐतिहासिक शेख जायेद मस्जिद के दौरे के दौरान जिस तरह इस्लाम को शांति और सद्भावना का प्रतीक बताया, उससे भारत में सांप्रदायिक राजनीति को तूल देने वाले उनके कुछ समर्थकों को सबक लेना चाहिए।

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