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सदन के सरोकार

नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि जिन लोगों को जनता ने खारिज कर दिया है, वे संसद में कामकाज नहीं होने दे रहे हैं। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी ने एक बार फिर शीतकालीन सत्र के निराशाजनक समापन की तरफ ध्यान खींचा है।

Author नई दिल्ली | January 2, 2016 12:04 AM
भारतीय संसद

दिल्ली से मेरठ के लिए चौदह लेन के एक्सप्रेस वे की आधारशिला रखने के बाद नोएडा में जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ और बातों के साथ-साथ संसद के शीतकालीन सत्र में बने रहे गतिरोध की तरफ भी लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि जिन लोगों को जनता ने खारिज कर दिया है, वे संसद में कामकाज नहीं होने दे रहे हैं। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी ने एक बार फिर शीतकालीन सत्र के निराशाजनक समापन की तरफ ध्यान खींचा है। मानसून सत्र में ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं घोटाला छाया रहा, और सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था। इसलिए लंबित विधेयकों से जुड़ी आस शीतकालीन सत्र पर आकर टिक गई थी। मगर यह सत्र भी हंगामे के साथ शुरू हुआ और हंगामे के साथ ही खत्म। जैसे-तैसे कुछ विधेयक पारित हुए। राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है। लिहाजा, मानसून सत्र की तरह शीतकालीन सत्र में भी राज्यसभा ही सरकार की परेशानी का सबब बनी रही। इस स्थिति में विपक्ष के व्यवहार से लेकर राज्यसभा के औचित्य तक पर सवाल उठे। राज्यसभा की परिकल्पना संसदीय व्यवस्था में राज्यों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के मकसद से की गई थी। मगर राजग की पहली सरकार के समय इसकी संघीय अवधारणा नष्ट कर दी गई, जब एक विधेयक पारित कर राज्यसभा के उम्मीदवार के लिए किसी भी राज्य से चुने जाने का रास्ता साफ कर दिया गया। इस समय राज्यसभा में ही विपक्ष ताकतवर है। लोकसभा में तो मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को इतनी सीटें ही नहीं मिल पार्इं कि वह विपक्ष के नेता-पद की दावेदारी कर सके। लिहाजा, सरकार के कई प्रस्तावों के भविष्य को लेकर प्रमुख सवाल यही रहता है कि क्या राज्यसभा की बाधा पार हो पाएगी?

शीतकालीन सत्र के एजेंडे में विसलब्लोअर्स विधेयक, भ्रष्टाचार निरोधक संशोधन विधेयक, रियल एस्टेट (नियमन एवं विकास) जैसे कई बहुत महत्त्वपूर्ण विधेयक थे। पर ये पारित नहीं हो सके। संसद का काफी वक्त विपक्ष के हंगामों की भेंट चढ़ गया। यह सही है कि सदन की कार्यवाही को किसी दफ्तरी कामकाज की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार के बड़े गलत फैसलों का विरोध करने या किसी ज्वलंत मुद््दे पर देश का ध्यान खींचने के लिए कई बार कार्यवाही ठप करने का विपक्ष का व्यवहार समझा जा सकता है। पर जिस तरह नेशनल हेरल्ड मामले को लेकर कांग्रेस ने कार्यवाही नहीं चलने दी, वह बेतुके विरोध का ही उदाहरण था। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के पीछे सरकार का हाथ बताना और कार्यवाही न चलने देना सदन में अपनी मौजूदगी का दुरुपयोग है। सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि जीएसटी विधेयक इस सत्र में भी पारित नहीं हो सका। जबकि जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर की पहल यूपीए सरकार के समय ही हुई थी और आम राय से इसका मसविदा तैयार करने के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की एक समिति बनाई गई थी। जीएसटी के नए विधेयक को लेकर कांग्रेस ने कुछ जायज सवाल उठाए थे। मसलन, जीएसटी की अधिकतम सीमा तय करने की मांग। प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से जीएसटी पर चर्चा कर गतिरोध तोड़ने की पहल की थी। फिर मुख्य आर्थिक सलाहकार ने जो सुझाव दिए, उससे भी लग रहा था कि आम सहमति का रास्ता साफ हो गया है। फिर भी, शीतकालीन सत्र में जीएसटी पर संसद की मुहर नहीं लग सकी। संसद चले यह विपक्ष की भी जिम्मेवारी है।

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