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अघोषित संविधान

गणतंत्र दिवस के मौके पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से जारी विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना को गलत तरीके से पेश किए जाने के पीछे की सरकारी मंशा अब उजागर होने लगी है। उस विज्ञापन में पुराने संविधान की प्रस्तावना दी गई थी, जिसमें ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द नहीं हैं। इसे लेकर […]

Author Published on: January 30, 2015 3:44 PM

गणतंत्र दिवस के मौके पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से जारी विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना को गलत तरीके से पेश किए जाने के पीछे की सरकारी मंशा अब उजागर होने लगी है।

उस विज्ञापन में पुराने संविधान की प्रस्तावना दी गई थी, जिसमें ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द नहीं हैं। इसे लेकर विवाद उठा तो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सफाई दी कि उसे संशोधित संविधान की प्रस्तावना उपलब्ध नहीं हो पाई थी। अब दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि इन दो शब्दों को संविधान की प्रस्तावना से हटाने को लेकर बहस हो रही है तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। ये दोनों शब्द आपातकाल के समय इंदिरा गांधी सरकार ने शामिल कराए थे, इसलिए उसके पीछे राजनीतिक मकसद से इनकार नहीं किया जा सकता। शिवसेना ने तो साफ मांग की है कि इन दोनों शब्दों को प्रस्तावना से हटा दिया जाना चाहिए।

यह सब देखते हुए क्या यह समझा जाना चाहिए कि भाजपा एक तरह से जानबूझ कर इस मुद्दे को उभारना चाहती है, ताकि वह संविधान की प्रस्तावना में संशोधन की जरूरत रेखांकित कर सके। भले इन दोनों शब्दों को संविधान के बयालीसवें संशोधन के तहत शामिल किया गया, पर हकीकत यह है कि पूरे संविधान में ये शब्द भारतीय व्यवस्था के आधारभूत ढांचे को संभाले हुए हैं।

पंथनिरपेक्ष राज्य की प्रतिज्ञा का अर्थ है कि देश के सभी नागरिकों को बगैर धार्मिक भेदभाव के बराबरी का हक दिलाया जाएगा। संविधान की पहली प्रस्तावना में इन दोनों शब्दों को इसलिए नहीं रखा गया कि आंबेडकर का तर्क था कि जब पूरे संविधान में ये दोनों शब्द ध्वनित हो रहे हैं तो इन्हें अलग से रेखांकित करने की जरूरत नहीं है। रविशंकर प्रसाद इस तथ्य से अनजान नहीं हैं। फिर वे शिवसेना की मांग को उकसा रहे हैं तो वह बेवजह नहीं कहा जा सकता। सवाल है कि जो लोग संविधान की प्रस्तावना से इन शब्दों को हटाना चाहते हैं, क्या वे संविधान की तमाम धाराओं से भी उनकी गूंज मिटाने की मांग करेंगे।

पंथनिरपेक्ष शब्द को लेकर शिवसेना और भाजपा की चिढ़ छिपी नहीं है। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने बाल ठाकरे के हवाले से कहा भी कि विभाजन के बाद मुसलमानों के देश छोड़ कर चले जाने के बाद अब यहां सिर्फ हिंदू बचे हैं। ऐसे में पंथनिरपेक्षता का झगड़ा बचा ही नहीं। भाजपा का विकास भी हिंदुत्व की विचारधारा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए हुआ है। हर चुनाव में वह हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे उठाती रही है। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्पष्ट दीख रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर पूरी आक्रामकता के साथ धर्मांतरण और घर वापसी के कार्यक्रम चला रहे हैं। सरकार उनकी हरकतों पर मौन है।

ऐसे में संविधान की पुरानी प्रस्तावना उसे अपने अनुकूल जान पड़ती है तो हैरानी की बात नहीं। लेकिन इस तरह कोई सरकार संविधान के किसी रूप को स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकती। उसमें संशोधन के बाद ही नए रूप में इस्तेमाल करने की अधिकारी है। पुरानी प्रस्तावना की आड़ में वह अपना अघोषित संविधान लागू करने की छूट नहीं ले सकती। पहले ही अनेक कानूनों और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों में बदलाव कर नरेंद्र मोदी सरकार विवाद मोल ले चुकी है, अब संविधान के मूल स्वरूप को धुंधला करने की कोशिश की गई तो उसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

 

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