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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राजधानी में ईसाई समुदाय के एक समारोह को संबोधित करते हुए जो कहा, उसकी उम्मीद उनसे महीनों से की जा रही थी। धार्मिक असहिष्णुता और इस तर्ज पर होने वाली हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों का समान सम्मान करती है और […]

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राजधानी में ईसाई समुदाय के एक समारोह को संबोधित करते हुए जो कहा, उसकी उम्मीद उनसे महीनों से की जा रही थी। धार्मिक असहिष्णुता और इस तर्ज पर होने वाली हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों का समान सम्मान करती है और अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक से ताल्लुक रखने वाले किसी भी धार्मिक समूह को दूसरों के खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से घृणा फैलाने की इजाजत नहीं देगी।

यों संसद में अपने पहले संबोधन में ही उन्होंने इस आशय का संदेश दिया था। तब उन्होंने कहा था कि अगर एक अंग अस्वस्थ हो तो हम शरीर को स्वस्थ नहीं कह सकते। फिर स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति-धर्म के झगड़े भुला दें। लेकिन हुआ यह कि खुद उनके खेमे के लोगों ने उनके इन संदेशों को तवज्जो नहीं दी। नफरत फैलाने की कोशिशें कभी ‘लव जिहाद’ के विरोध के नाम पर चलती रही हैं, कभी ‘घर-वापसी’ के नाम पर।

कई बार सीधे सांप्रदायिक तनाव फैलाने के प्रयास हुए। दिल्ली में त्रिलोकपुरी, बवाना, नंदनगरी में हुई ऐसी घटनाएं और एक के बाद एक कई गिरजाघरों पर हमले या तोड़-फोड़ के मामले इसी के उदाहरण हैं। आग भड़काने में त्रिलोकपुरी में भी भाजपा के पूर्व स्थानीय विधायक का नाम आया और बवाना में भी। सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ सांसद भी पीछे नहीं रहे।

साध्वी निरंजन ज्योति के बयान से उठा बवाल थमा भी नहीं था कि साक्षी महाराज शुरू हो गए। गोरखपुर से भाजपा के सांसद योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों हर मस्जिद में मूर्ति रखने की मंशा जाहिर की। विहिप के प्रवीण तोगड़िया जैसे लोगों के आपत्तिजनक बयानों की तो कोई गिनती ही नहीं है। ऐसे तत्त्व यह मान कर चलते रहे हैं कि चूंकि केंद्र में उनके अपने लोगों की सरकार है, इसलिए वे कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। पर वे यह भूल जाते हैं कि मोदी को जनादेश किसी और बात के लिए नहीं, भ्रष्टाचार और महंगाई से निजात दिलाने और विकास के लिए मिला है। भाजपा का लोकसभा चुनाव में जोर ही इसी पर था, सबका साथ सबका विकास। विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन सारे दुखद प्रसंगों के दौरान चुप्पी साधे रहे। वे तब भी कुछ कहने को राजी नहीं हुए थे, जब राज्यसभा में विपक्ष उनके बयान की मांग पर अड़ा रहा।

अब जाकर प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ने की जरूरत महसूस की, तो इसकी दो-तीन खास वजहें हो सकती हैं। एक यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ने पर दो बार चिंता जताई है, पहली बार अपनी भारत यात्रा के दौरान और दूसरी बार स्वदेश लौटने के बाद।

इससे इस धारणा को बल मिला कि ऐसी घटनाओं के कारण देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर बुरा असर पड़ रहा है। दूसरे, दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह जताया है कि सौहार्द को चोट पहुंचाने वाले बयानों और वाकयों के चलते भी भाजपा को नुकसान हुआ। तीसरी बात यह कि इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में विकास के एजेंडे के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने लगे थे। लिहाजा, काफी देर से ही सही, मोदी को खामोशी तोड़नी पड़ी। अगर उन्होंने समय से चेतावनी दी होती, तो उसकी चमक कुछ और होती। बहरहाल, उन्होंने माकूल संदेश दिया है। पर यह काफी नहीं है। इस संदेश की परीक्षा यह है कि जब भी इसके विपरीत कुछ हो, तो प्रधानमंत्री कार्रवाई का निर्देश भी दें।

 

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