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पाकिस्तान की पलटी

रूस के उफा शहर में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मिले और उस दौरान आतंकवाद और मुंबई हमले से जुड़ी सुनवाई आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत हुई तो दोनों देशों के रिश्तों में खटास कुछ कम होने की उम्मीद जगी। मगर पाकिस्तान ने भारत […]

Author July 14, 2015 18:07 pm

रूस के उफा शहर में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मिले और उस दौरान आतंकवाद और मुंबई हमले से जुड़ी सुनवाई आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत हुई तो दोनों देशों के रिश्तों में खटास कुछ कम होने की उम्मीद जगी।

मगर पाकिस्तान ने भारत की इस पहल को एक बार फिर यह कह कर झटका दे दिया कि वह लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर और मुंबई हमले के सरगना जकी उर रहमान लखवी की आवाज का नमूना नहीं दे सकता। उसका कहना है कि मुंबई आतंकवादी हमले की सुनवाई कर रही रावलपिंडी की अदालत ने चार साल पहले ही लखवी की आवाज का नमूना हासिल करने संबंधी भारत की अर्जी खारिज कर दी थी, पाकिस्तान में ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत किसी व्यक्ति की आवाज का नमूना दिया जा सके।

फिर नवाज शरीफ के विदेश और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने स्पष्ट किया है कि जब तक भारत कश्मीर मसले को सुलझाने की पहल नहीं करता, तब तक उसके साथ किसी भी प्रकार की बातचीत का सिलसिला नहीं शुरू हो सकता। पाकिस्तान की यह पलटी हैरान करने वाली नहीं है। जब भी भारत शांति प्रक्रिया बहाल करने की दिशा में पहल करता है, पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा उठा कर खुद को किनारे कर लेता है। रही लखवी की आवाज के नमूने की बात, तो छिपा नहीं है कि किस तरह पाकिस्तान सरकार की शिथिलता के चलते, सबूतों के अभाव में लखवी को पाकिस्तान की अदालत ने रिहा कर दिया था। बार-बार दबाव बनाने के बावजूद पाकिस्तान सरकार ने अदालत में भारत का पक्ष ठीक से नहीं रखा था।

अनेक मौके इस बात के गवाह हैं जब पाकिस्तान के हुक्मरान किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय नेताओं से मिलते हैं, तो आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने, मुंबई हमले से जुड़े तथ्यों को साझा करने आदि को लेकर गरमजोशी दिखाते हैं, पर अपने देश वापस लौटने के बाद वही पुराना रुख अख्तियार कर लेते हैं।

इसके पीछे बड़ी वजह कट््टरपंथी ताकतों का वहां की सरकार पर लगातार दबाव बने रहना है। उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात के बाद पाकिस्तान के अखबारों में दबाव बनना शुरू हो गया था कि नवाज शरीफ ने नरेंद्र मोदी से कश्मीर मसले का जिक्र किए बगैर आतंकवाद रोकने और मुंबई हमले के मामले में सहयोग पर रजामंदी कैसे दे दी।

जाहिर है, इसी दबाव के चलते नवाज शरीफ सरकार ने अपना सुर बदल लिया। भारत कई बार पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों, मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले आदि से जुड़े अनेक प्रमाण वहां की सरकार को सौंप चुका है, मगर वह उन्हें अपर्याप्त या झूठा कह कर खारिज करती रही है। अब लखवी के मसले पर सरताज अजीज ने पलट कर कहा है कि भारत बलूचिस्तान में दखलअंदाजी कर रहा है।

ऐसी दलीलों के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत को दोषी ठहराने की कोशिश पाकिस्तान बराबर करता रहा है। बेशक सार्क घोषणापत्र में उसने इस बात पर वचनबद्धता दर्ज की हो कि अपनी जमीन से वह किसी भी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों को नहीं चलने देगा, पर हकीकत यही है कि भारत के खिलाफ वह आतंकवाद को एक औजार की तरह इस्तेमाल करता रहा है। ऐसे में लखवी के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठा कर वह अपनी स्थिति कमजोर नहीं होने देना चाहता। हालांकि अमेरिका और यूरोपीय देश कई बार कह चुके हैं कि भारत के साथ संबंध सुधारने के मामले में पाकिस्तान को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी चाहिए। मगर पता नहीं वह कब इस बात को समझ पाएगा।

 

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