अभाव के स्कूल

‘स्वच्छ भारत अभियान’ केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साफ-सफाई और देश भर में शौचालयों की व्यवस्था को प्राथमिकता देने पर जोर है। मगर दूरदराज के इलाकों में सामान्य लोगों के लिए तो दूर, स्कूलों तक में अभी शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जिन स्कूलों में शौचालय हैं भी, उनकी […]

‘स्वच्छ भारत अभियान’ केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साफ-सफाई और देश भर में शौचालयों की व्यवस्था को प्राथमिकता देने पर जोर है। मगर दूरदराज के इलाकों में सामान्य लोगों के लिए तो दूर, स्कूलों तक में अभी शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जिन स्कूलों में शौचालय हैं भी, उनकी देखरेख और साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। गंदगी इस कदर होती है कि अगर कोई बच्चा उसका उपयोग करे तो उसके बीमार पड़ने की आशंका बनी रहती है।

क्या संबंधित महकमे इस तथ्य से अनजान हैं कि शौचालयों का साफ होना भी किसी बच्चे की अच्छी सेहत के लिए जरूरी पहलू है? इसलिए मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूलों में शौचालयों और सफाई की व्यवस्था को लेकर जिस तरह सख्त रुख अख्तियार किया, उसकी वाजिब वजहें हैं। इस मसले पर दाखिल एक अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सचिवों को तलब कर कहा कि स्कूलों में महज ढांचे को शौचालय के रूप में देखने और फिर उसे भुला देने के सोच के चलते ही यह समस्या अब तक बनी हुई है। यह छिपा नहीं है कि महज एक ढांचा खड़ा कर अक्सर उसे शौचालय के रूप में पेश कर दिया जाता है। जबकि अगर उसकी नियमित रूप से साफ-सफाई न हो तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। पिछले कई सालों से इस समस्या के निदान संबंधी सरकारी दावों की हकीकत इसी से समझी जा सकती है कि अब अदालत ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों की ओर से इसके लिए बनाई गई योजनाओं की समीक्षा करने का फैसला किया है।

यह समस्या केवल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की नहीं है। देश के दूसरे राज्यों में हालत इससे बेहतर नहीं है। गौरतलब है कि करीब दो साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा था कि देश के तमाम सरकारी या निजी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में कक्षाएं, शिक्षक, पीने के साफ पानी और शौचालयों का इंतजाम होना चाहिए। लेकिन अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों ने इस दिशा में अब तक क्या किया है, यह सब जानते हैं। इससे ज्यादा अफसोसनाक और क्या होगा कि आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी देश के तीन चौथाई से ज्यादा स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है।

शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए भी कई साल गुजर चुके हैं और सरकारें शिक्षा-व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव लाने के दावे कर रही हैं। मगर सवाल है कि अगर बहुत सारे बच्चे महज पीने के पानी और शौचालयों के अभाव या उनमें गंदगी के चलते स्कूल नहीं जाते या बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह सरकारों के लिए शर्मिंदगी का विषय नहीं होना चाहिए कि स्कूलों में बहुत सारी लड़कियों को शौचालय के अभाव में जोखिम उठा कर खुले मैदानों में जाना पड़ता है या फिर वे घर लौट जाती हैं? कई अध्ययनों में यह तथ्य उजागर हो चुका है कि लड़कियों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की बड़ी वजहों में एक यह भी है कि उनके लिए स्कूलों में अलग शौचालयों का इंतजाम नहीं होता। विचित्र है कि जो काम सरकारों की जिम्मेदारी है और उसके लिए अपनी ओर से पहल करनी चाहिए, उसके लिए वे अदालतों की फटकार का इंतजार करती हैं!

 

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