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प्रशासन का दायरा

पुलिस सुधार के लिए बनी सोली सोराबजी समिति की रिपोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट की कई बार की हिदायत के बाद भी लागू नहीं हो पाई।

Author नई दिल्ली | April 23, 2016 2:10 AM
पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

लोकसेवा दिवस के अवसर पर लोकसेवकों यानी नौकरशाहों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने उनसे कहा कि वे बंद दायरे में काम करने के बजाय देश के विकास और लोगों के कल्याण के लिए बदलाव के वाहक बनें। बेशक यह अच्छा संदेश है, पर क्या ऐसा हो पाएगा! यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि नौकरशाही को इतनी स्वायत्तता हासिल नहीं है कि वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सके। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसे राजनीतिक नेतृत्व के तहत ही काम करना पड़ता है। फिर, हमारे देश में नौकरशाही के काम करने की शैली अंग्रेजी हुकूमत के जमाने में विकसित हुई थी और अब भी वह ढर्रा बहुत हद तक कायम है। इसलिए प्रशासन और आम जन के बीच एक खाई बनी हुई है।

प्रशासन को जनतांत्रिक तकाजों के अनुरूप यानी उसे लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और अधिक जवाबदेह बनाने के मकसद से समय-समय पर आयोग बने, समितियां गठित हुर्इं। पर उन आयोगों और समितियों की रिपोर्टें धूल खा रही हैं। इसलिए कि उनकी सिफारिशों पर अमल करने की इच्छाशक्ति हमारे राज्यतंत्र या राजनीतिक नेतृत्व ने नहीं दिखाई। पुलिस सुधार के लिए बनी सोली सोराबजी समिति की रिपोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट की कई बार की हिदायत के बाद भी लागू नहीं हो पाई। अमल न करने के पीछे राज्य सरकारों की दलील रही है कि इन्हें लागू करना उनके अधिकारों में कटौती करना होगा; फिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उनके दायित्व के पालन में कठिनाई भी आएगी।

पर असल वजह यह है कि पुलिस पर अपना अंकुश कोई भी सरकार कम करना नहीं चाहती। दूसरी समितियों या आयोगों की सिफारिशें भी इसीलिए लागू नहीं की गर्इं, क्योंकि उन्होंने प्रशासनिक निर्णयों और कामकाज की संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने की अपेक्षा करते हुए उन्हें राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त रखने पर जोर दिया था। जो राजनीतिक संस्कृति प्रशासन से मनमाने ढंग से काम लेने, तबादलों के जरिए किसी को पुरस्कृत तथा किसी को दंडित करने की आदी हो चुकी है, उसे कानून का शासन तथा निष्पक्षता के मूल्य कैसे रास आ सकते हैं!

इसलिए हैरत की बात नहीं कि भले स्वच्छ प्रशासन का दम भरा जाता हो, पर कहीं संजीव चतुर्वेदी जैसे सतर्कता अधिकारी को प्रताड़ित होना पड़ता है तो कहीं अशोक खेमका जैसे आईएएस अधिकारी को बार-बार तबादले का दंश सहना पड़ता है। एक दशक से ज्यादा समय से हर साल बीस-इक्कीस अप्रैल को सिविल सर्विस डे यानी लोक सेवा दिवस मनाया जाता रहा है। इस अवसर पर अधिकारियों का मनोबल बढ़ाने, देशसेवा में बढ़-चढ़ कर योगदान के लिए आह्वान करने, आपसी सहयोग बढ़ाने जैसी भली-भली बातें की जाती रही हैं। प्रधानमंत्री ने अफसरों की हौसला आफजाई की, तो इसका मौका भी था और दस्तूर भी। उनकी चिंता यह भी रही होगी कि कई बड़ी सरकारी परियोजनाएं ठप हैं और कई प्रमुख कार्यक्रमों में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है।

निश्चय ही, सरकार के फैसलों, नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन का दारोमदार नौकरशाही पर रहता है। अफसर अधिक तत्परता और अधिक कुशलता से काम कर सकें, इसके लिए यह भी देखना होगा कि उन पर प्रक्रियाओं तथा औपचारिकताओं का बोझ कैसे कम किया जाए। इसके लिए कई सुझाव प्रशासनिक सुधार की खातिर समय-समय पर बनी समितियों की रिपोर्टों में मौजूद हैं। नई चुनौतियों तथा नई तकनीकों के मद््देनजर कुछ नए उपाय भी सोचे जाने चाहिए। पर लोकसेवक बदलाव के वाहक तभी हो सकते हैं जब सरकारों में इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति हो।

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