नसीहत नहीं सलाह

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जिस तरह जाते-जाते नरेंद्र मोदी और भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख गए, उससे परमाणु करार और निवेश संबंधी समझौतों को लेकर पैदा हुआ उत्साह ठंडा पड़ गया लगता है। सीरीफोर्ट ऑॅडिटोरियम में विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा कि संविधान में हर व्यक्ति को बगैर […]

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जिस तरह जाते-जाते नरेंद्र मोदी और भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख गए, उससे परमाणु करार और निवेश संबंधी समझौतों को लेकर पैदा हुआ उत्साह ठंडा पड़ गया लगता है। सीरीफोर्ट ऑॅडिटोरियम में विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा कि संविधान में हर व्यक्ति को बगैर किसी उत्पीड़न, भय और भेदभाव के स्वेच्छा से अपनी आस्था का चुनाव करने और उसके अनुसरण का अधिकार है। भारत की तरक्की इस बात पर निर्भर करेगी कि वह धार्मिक भेदभाव से कितना मुक्त हो पाता है।

देखना है, नरेंद्र मोदी इसे कितनी गंभीरता से लेते हैं। ओबामा का बयान ऐसे समय आया है, जब देश में धर्मांतरण और घर वापसी जैसे कार्यक्रमों को लेकर विरोध का वातावरण है। संसद के पिछले सत्र में राज्यसभा में धर्मांतरण के मुद्दे पर विपक्ष ने प्रधानमंत्री से जवाब की मांग की तो वे सत्रावसान तक वहां नहीं गए। इसका नतीजा यह हुआ कि भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान आबंटन, बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आदि से जुड़े विधेयक लटक गए। इन्हें लेकर सरकार को अध्यादेश जारी करने पड़े।

बजट सत्र में भी स्थिति इससे अलग नजर नहीं आ रही। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी जिन विकास परियोजनाओं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने संबंधी योजनाओं पर तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं, उनमें कामयाबी आसान नहीं लगती। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि संगठनों ने धर्मांतरण के कार्यक्रम आयोजित करना शुरू किया, कुछ भाजपा नेता सार्वजनिक मंचों से सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले वक्तव्य देने लगे तो नरेंद्र मोदी ने उन्हें बरजा था, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अपील की थी कि वे सरकार के विकास संबंधी एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद करें। मगर संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों ने उनकी बातें अनसुनी कर दीं। बराक ओबामा की नसीहत का उन पर भला क्या असर पड़ने वाला!

सामाजिक, सांप्रदायिक विद्वेष की जड़ें रोपने का सारा दोष केवल संघ को नहीं दिया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने भी चुपचाप उसके दबाव को स्वीकार किया और उसके अनुरूप योजनाओं, कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की कोशिश की। उनकी सरकार के पूरे कामकाज पर संघ की छाप दिखाई देने लगी है।

यहां तक कि गणतंत्र दिवस के मौके पर जारी सरकारी विज्ञापनों में संविधान की पुरानी प्रस्तावना को प्रकाशित किया गया, जिसमें ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द नदारद हैं। स्वाभाविक ही सवाल उठ रहे हैं कि भाजपा सरकार संविधान की मूल अवधारणा को नजरअंदाज करके किस तरह की व्यवस्था कायम करना चाहती है। नरेंद्र मोदी को लगता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और औद्योगिक विकास जादू की वह छड़ी है, जिसे घुमाते ही देश की समस्याएं दूर हो जाएंगी। इसलिए औद्योगिक कानूनों को लगातार लचीला बनाने, विकास परियोजनाओं में नौकरशाही का दखल खत्म करने आदि को लेकर लगातार प्रयास हो रहे हैं।

मगर सामाजिक समरसता की जिम्मेदारी शायद उन्होंने संघ और उसके सहयोगी संगठनों के भरोसे छोड़ दी है। यह नहीं भूला जा सकता कि सामाजिक अस्थिरता और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच भय का माहौल निवेश की राह में उसी तरह रोड़ा हैं, जिस तरह भ्रष्टाचार और नौकरशाही का हस्तक्षेप। भाजपा को अभी यही लगता है कि केंद्र में उसकी सरकार हिंदुत्ववादी जनाकांक्षा की स्वीकृति का प्रतिफल है, इसलिए उसके अनुरूप ही उसे काम करने की जरूरत है। मगर देश का संविधान किसी सरकार को इसकी इजाजत नहीं देता कि वह सिर्फ समुदाय विशेष को ध्यान में रख कर काम करे। जिस तरह मोदी ने ओबामा के साथ दोस्ती का बड़े उत्साह से बार-बार जिक्र किया, उनके प्रति गरमजोशी दिखाई, उम्मीद की जाती है कि वे जाते वक्त कही उनकी बातों पर भी गंभीरता दिखाएंगे।

 

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