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संपादकीयः सच्चाई की जीत

इसरो जासूसी कांड में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस. नांबी नारायणन को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि जासूसी कांड में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, वे पाक साफ हैं।

Author September 17, 2018 4:29 AM
इसरो जासूसी कांड की गूंज 1994 में सुनाई दी थी, जब मालदीव की एक महिला के पास से इसरो के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज बरामद हुए थे।

इसरो जासूसी कांड में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक एस. नांबी नारायणन को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि जासूसी कांड में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, वे पाक साफ हैं। नांबी नारायण के लिए शीर्ष अदालत का यह फैसला एक बड़ी राहत है। उन्हें चौबीस साल बाद न्याय मिला। अपने माथे से जासूसी का कलंक हटाने के लिए ढाई दशक तक उन्हें जिस मानसिक वेदना से गुजरना पड़ा, उसकी भरपाई किसी भी उपाय से नहीं हो सकती, मुआवजों की रकम से भी नहीं। हां, न्याय मिलने से नांबी नारायण को संतोष जरूर हुआ है और उन्हें उम्मीद बंधी है कि जिन लोगों ने उन्हें फंसाया, उन्हें सजा मिलेगी। इस अमानवीय घटना ने एक बार फिर साबित किया कि पुलिस फर्जी मामलों में फंसा कर कैसे निर्दोष लोगों का जीवन तबाह कर सकती है। ऐसे में यह गंभीर सवाल उठता है कि नांबी नारायणन के साथ जो कुछ हुआ, उसके लिए क्या सिर्फ पुलिस जिम्मेदार है, या हमारा पूरा तंत्र, जिसका एक हिस्सा पुलिस तंत्र भी है।

इसरो जासूसी कांड की गूंज 1994 में सुनाई दी थी, जब मालदीव की एक महिला के पास से इसरो के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज बरामद हुए थे। ये दस्तावेज क्रायोजनिक इंजन परियोजना के थे। उस वक्त नांबी नारायणन ही इस परियोजना के प्रमुख थे। इस महिला की गिरफ्तारी के बाद नांबी नारायणन, दो अन्य वैज्ञानिकों और एक महिला को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने अपनी तरह से जांच की और नांबी नारायणन पर पाकिस्तान को गोपनीय दस्तावेज बेचने का आरोप लगाया। उसी साल यह मामला सीबीआइ के पास चला गया। सीबीआइ को कोई सबूत नहीं मिले और निचली अदालत ने सारे अभियुक्तों को बरी कर दिया। इसके बाद केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार ने फिर से मामले की जांच के आदेश दिए। हाई कोर्ट ने भी फिर से जांच के आदेश को कायम रखा, लेकिन मार्च 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाइ कोर्ट के इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसरो जासूसी कांड ने केरल की राजनीति में हलचल मचा दी थी और इसके बाद ही राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को इस्तीफा देना पड़ा था।

यह घटनाक्रम बताता है कि देश के एक होनहार वैज्ञानिक को अपने जीवन का लंबा वक्त कानूनी लड़ाई में झोंकने को मजबूर होना पड़ा, और सिर्फ पुलिस की करतूतों से। वरना यह वैज्ञानिक देश को अपना अमूल्य योगदान देकर वैज्ञानिक उपलब्धियों से कितना समृद्ध बना सकता था, कोई नहीं जानता। जिस वक्त नांबी नारायणन को गिरफ्तार किया गया था उस वक्त वे क्रोयोजनिक इंजन के विकास पर ही काम कर रहे थे। सर्वोच्च अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में केरल पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए समिति बनाई है। इससे यह उम्मीद बनी है कि मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाएगा और संबंधित दोषी पुलिस अधिकारियों को न्याय के कठघरे में लाया जाएगा। करुणाकरण की बेटी ने इस कांड में जिस राजनीतिक साजिश की ओर इशारा किया है, उससे भी मामले की जांच को नई दिशा मिल सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केरल पुलिस राजनेताओं के इशारे पर काम कर रही थी। क्या नांबी नारायणन की गिरफ्तारी के पीछे कोई और राज थे? यह सब तो जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन एक वैज्ञानिक के साथ जो कुछ हुआ, उसका सबसे ज्यादा नुकसान देश को हुआ है। इसे एक वैज्ञानिक प्रतिभा की हत्या से कम नहीं कहा जा सकता। यह घटना पूरे तंत्र को बेनकाब करती है!

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