गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए वर्षों से प्रयास चल रहा है। इसके लिए भारी-भरकम बजट भी आबंटित किए गए। मगर सकारात्मक नतीजे कभी सामने नहीं आए। गंगा कार्ययोजना में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर करीब दशक भर पहले केंद्र सरकार ने बहुआयामी कार्यक्रम ‘नमामि गंगे’ की शुरुआत की थी। प्रारंभिक दौर में इसमें प्रगति भी दिखी थी और उम्मीद बंधी थी कि वर्षों से मैली हो रही गंगा धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अब स्वच्छ हो जाएगी। निराशा की बात है कि ‘नमामि गंगे’ भी सही दिशा में नहीं बढ़ पाई।
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रपट से उन सभी लोगों को मायूसी हुई है जो गंगा के निर्मल होने का इंतजार कर रहे थे। उत्तराखंड के बजट सत्र में पेश की गई कैग की रपट बताती है कि ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम क्रियान्वयन एजंसियों की विफलता के कारण वांछित नतीजे नहीं दे पाया। गौरतलब है कि इसके लिए केंद्र ने एक हजार करोड़ की राशि मुहैया कराई थी।
यह दुखद ही है कि गंगा कार्ययोजना की असफलता से नमामि गंगे से जुड़ी एजंसियों ने कोई सबक नहीं लिया। इस कार्यक्रम में खामियां ठीक वैसी ही थीं, जैसी पिछली योजना में थीं। ‘नमामि गंगे’ अपेक्षित परिणाम देने में क्यों विफल रही, इसे न केवल केंद्र को, बल्कि इस कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञों और संबंधित अधिकारियों को गंभीरता से लेना होगा।
इस परियोजना में नाकामी न केवल बड़ा आर्थिक नुकसान है, बल्कि उन सभी संकल्पों पर भी आघात है, जिनमें लोगों की यह इच्छा शामिल थी कि गंगा स्वच्छ और अविरल हो। मगर ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि इसमें कई स्तरों पर लापरवाही बरती गई।
हैरत की बात है कि गंगा की छोटी जलधाराओं के पास कूड़ा फेंके जाने से लेकर स्थानीय जरूरतों का आकलन किए बगैर कई तटों पर श्मशान घाट बना दिए गए। कैग ने जो खामियां उजागर की हैं, वह उन अधिकारियों को क्यों नहीं दिखा जो इस कार्यक्रम के अमल के लिए जिम्मेदार थे। अवजल शोधन संयंत्र के दोषपूर्ण डिजाइन में लापरवाही क्यों और किस स्तर पर हुई? मानदंडों का उल्लंघन करने वालों की अब जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
