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गंगा की गंदगी

सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री ने गंगा सफाई को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार करते हुए इस दिशा में तेजी से प्रयास करने की बात कही थी। वह तेजी फिलहाल महज कागजों में नजर आती है

Author नई दिल्ली | January 28, 2016 12:05 AM
गंगा घाट का एक नजारा (चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।)

प्रदूषण से मुक्ति के लिए तरसती गंगा के उद्धार के लिए नमामि गंगे योजना का प्रवाह अब जल संसाधन मंत्रालय के साथ ही अन्य मंत्रालयों की ओर भी मोड़ दिया गया है। यह न सिर्फ मोदी सरकार की इस महत्त्वाकांक्षी योजना की कामयाबी, बल्कि इसके आड़े आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए भी वक्त की जरूरत है। इसके तहत केंद्र सरकार ने मानव संसाधन, ग्रामीण विकास, पर्यटन, आयुष, जहाजरानी, पेयजल और स्वच्छता तथा युवा मामलों के मंत्रालयों को भी इसमें शामिल करने का फैसला किया है। मानव संसाधन मंत्रालय को गंगा सहित देश की अन्य नदियों की सफाई और पुनर्जीवन की खातिर नदी विज्ञान की पढ़ाई के लिए एक राष्ट्रीय संस्थान या विश्वविद्यालय की रूपरेखा तैयार करने को कहा गया है। इस संस्थान से निकलने वाले विशेषज्ञ गंगा सहित देश की अन्य नदियों और जलस्रोतों की स्वच्छता सुनिश्चित करने में सहयोग देते रहेंगे।

यह मंत्रालय पर्यावरण-साक्षरता और नदी-स्वच्छता के प्रति जनजागरूकता के प्रसार का भी काम करेगा। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को जिम्मेदारी दी गई है कि ठोस और तरल कचरे के निस्तारण की सुविधाएं ग्राम पंचायतों के सहयोग से ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाए और आदर्श गंगा ग्राम बनाए। पर्यटन मंत्रालय को पर्यावरण-अनुकूल गतिविधियां संचालित-प्रोत्साहित करने, आयुष मंत्रालय को गंगा क्षेत्र में औषधीय बागवानी और विविधता सुनिश्चित करने, जहाजरानी मंत्रालय को नौवहन और नदी परिवहन का ढांचा तैयार करने, ग्रामीण विकास मंत्रालय को नरेगा के तहत नमामि गंगे योजना संबंधी कार्य कराने आदि के काम सौंपे गए हैं।

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इस समूची कवायद के बीच यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि विभिन्न मंत्रालयों के बीच दायित्वों के आबंटन मात्र से क्या नमामि गंगे योजना की कामयाबी सुनिश्चित हो जाएगी? गौरतलब है कि सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री ने गंगा सफाई को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार करते हुए इस दिशा में तेजी से प्रयास करने की बात कही थी। वह तेजी फिलहाल महज कागजों में नजर आती है, जमीन पर तो यह योजना कछुआ चाल की शिकार है। अफसोसनाक यह भी है कि गंगा सफाई के मद में पिछले तीस सालों में चार हजार करोड़ से ज्यादा की रकम बहाई जा चुकी है, लेकिन नजीजा ढाक के तीन पात है। गंगा में शहरों के सीवरों-नालियों की गंदगी और औद्योगिक कचरा लगातार बढ़ता-बहता रहा है। मोदी सरकार ने पांच साल में बीस हजार करोड़ रुपए खर्च करके गंगा को समग्र तौर पर संरक्षित और स्वच्छ करने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन यहां ध्यान रखना चाहिए कि किसी योजना के लिए आबंटित ज्यादा रकम उसकी सफलता की गारंटी नहीं हो सकती।

इसके लिए गंगा प्रदूषण के कारणों की गहराई से शिनाख्त करके उन्हें समग्रता में दूर करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, हरित न्यायाधिकरण और तमाम सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाएं गंगा की गंदगी दूर करने के लिए प्रयासरत रहे हैं लेकिन उनकी कोशिशों के भी अपेक्षित नतीजे न निकल पाने की वजहों से सबक लिया जाना जरूरी है। अनियोजित शहरीकरण और औद्योगीकरण ने इस स्थिति में कोढ़ में खाज का काम किया है। ऐसे में गंगा को मैया, मोक्षदायिनी, पतित पावनी आदि मानने वाले हमारे भावुक देश में गंगा सफाई को भी भावनाओं से जोड़ कर क्या एक राष्ट्रीय सरोकार नहीं बनाया जाना चाहिए? सितंबर 2008 में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी की संज्ञा दी थी। आखिर उसकी गंदगी से झांक कर यह संज्ञा हमें कब तक चिढ़ाती रहेगी?

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