इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि कुछ विद्यार्थियों के सिर्फ असहमति जताने या विरोध जाहिर करने की वजह से उनके समूचे समूह की पढ़ाई के आगे के रास्ते को बंद करने का फरमान जारी कर दिया जाए और इस तरह उनके भविष्य को बाधित करने की कोशिश की जाए। हैरानी की बात यह है कि ऐसा फरमान जारी करने वाली संस्था संविधान के दायरे में रह कर काम करने का दावा करती है और महज इस बात के लिए आहत हो जाती है कि कुछ विद्यार्थियों ने एक मुद्दे पर लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध जाहिर किया!

गौरतलब है कि नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, यानी नालसार में कुछ विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था। सिर्फ इस बात के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष की ओर से एक विचित्र आदेश जारी कर दिया गया, जिसके तहत 2026 में नालसार से स्नातक किए हुए सभी विद्यार्थियों को अगले आदेश तक देश भर के बार काउंसिलों में अधिवक्ता के रूप में नामांकन लिए जाने पर रोक लगा दी गई।

यह अपने आप एक ऐसा फैसला था, जिसे लोकतंत्र और संविधान के तहत मिले अधिकारों पर चोट के तौर पर देखा गया। स्वाभाविक ही बार काउंसिल के इस रुख की तीखी आलोचना हुई। यहां तक कि खुद सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने भी विद्यार्थियों के विरोध को उनकी लोकतांत्रिक असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार की दृष्टि से ही देखा और बार काउंसिल के फैसले पर कड़ी नाराजगी जाहिर की।

चारों ओर से उठे सवालों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने अपने फरमान को वापस ले लिया, लेकिन इससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि असहमति और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों को बाधित करने से देश में लोकतंत्र की कैसी तस्वीर तैयार होगी। अगर कुछ विद्यार्थी कानून के दायरे में रहते हुए किसी मुद्दे पर शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध जताते हैं, तो उनके भविष्य को बाधित करने की धमकी देकर उन्हें चुप कराने की कोशिश क्या बेवजह की दखलअंदाजी नहीं है?

बार काउंसिल ऑफ इंडिया देश में वकीलों के पेशे को विनियमित करने वाली शीर्ष संस्था है। मगर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कानून के ही विद्यार्थियों के अभिव्यक्ति के अधिकार को चोट पहुंचाने की कोशिश के जरिए उसने क्या हासिल किया?

विद्यार्थियों की ओर से विरोध का कारण कोई भी हो सकता है, लेकिन अगर कानून के दायरे में रह कर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी असहमति जाहिर की जाती है, तो इसका समाधान संवाद के जरिए निकाला जाएगा या धमकी देकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की जाएगी? बार काउंसिल के अध्यक्ष के लिए इससे असहज स्थिति क्या हो सकती है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के विरोध की वजह से अपना कठोर फरमान जारी कर दिया था और प्रधान न्यायाधीश ने खुद विद्यार्थियों के विरोध को उनका लोकतांत्रिक अधिकार माना!

किसी वैधानिक संस्था में शीर्ष पद की जिम्मेदारी और गंभीरता को समझने के बजाय हड़बड़ी या नाहक शक्ति प्रदर्शन के प्रयास को दरअसल असहमति के स्वर को दबाने के तौर पर ही देखा जाएगा। मगर इस पर लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग नागरिकों सहित खुद प्रधान न्यायाधीश की ओर से जैसी प्रतिक्रिया आई, वह उम्मीद जगाने वाली है।