केंद्र और राज्य सरकारों के दावों के बावजूद देश में भगदड़ की घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। बिहार में नालंदा जिले के मघड़ा गांव में मंगलवार को प्राचीन शीतला माता मंदिर में ऐसी ही एक हृदय विदारक घटना में कम से कम आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं। यह हादसा बताता है कि इस तरह की पहले की घटनाओं से कहीं कोई सबक नहीं लिया गया।
प्रारंभिक जांच में इस भगदड़ का कारण मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटना बताया जा रहा है, हालांकि इसकी असली वजह गहन जांच-पड़ताल के बाद ही सामने आ पाएगी। सवाल है कि धार्मिक स्थलों और बड़े आयोजनों में लोगों की भीड़ को व्यवस्थित एवं नियंत्रित करने के लिए शासन एवं प्रशासन की ओर से पुख्ता बंदोबस्त क्यों नहीं किए जाते?
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि भगदड़ की घटनाएं लगभग वैसे ही कारणों से होती हैं, जैसे पहले हो चुकी होती हैं। हर बार जांच, कठोर कार्रवाई करने, सबक सीखने की बातें की जाती हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहता है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ माह में भगदड़ की कई बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। कुंभ में भगदड़ मचने से अनेक लोग मारे गए थे। इसके बाद बंगलुरु में आरसीबी की जीत के जश्न में आयोजित समारोह में भगदड़ से कई लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा पुरी में भगदड़ ने कई लोगों की जान ले ली थी। इससे पहले हाथरस के एक आश्रम में भगदड़ की वजह से बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की घटना को भी नहीं भूला जा सकता।
आखिर ऐसी कितनी घटनाओं के बाद शासन और प्रशासन चेतेगा। कहा जा रहा है कि नालंदा जिले में शीतला माता मंदिर में श्रद्धालुओं की अत्यधिक भीड़ जमा हो गई, जिससे भगदड़ मच गई। सवाल है कि स्थानीय प्रशासन धार्मिक स्थलों पर लोगों की संभावित भीड़ का अनुमान लगाने में इतना अक्षम क्यों है?
क्या इसका कारण उसकी संवेदनहीनता है या फिर संबंधित अधिकारी इस बात से निश्चिंत होते हैं कि कोई भी घटना हो जाए, उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। अक्सर यह देखा गया है कि इस तरह के मामलों में निचले स्तर के कर्मियों पर तो तात्कालिक कार्रवाई की जाती है, लेकिन संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती है।
धार्मिक स्थलों और बड़े आयोजनों में भगदड़ के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें लोगों की ज्यादा भीड़ जमा होना, बाहर निकलने की सही व्यवस्था न होना, भीड़ को संभालने एवं नियंत्रित करने की व्यवस्था का अभाव और आयोजन स्थल पर बुनियादी सुविधाओं की कमी शामिल है। कई बार ऐसे स्थलों पर अफवाह की वजह से भी इस तरह के हादसे होते हैं।
ऐसा नहीं है कि स्थानीय प्रशासन इन कारणों से अनभिज्ञ होता है, इसके बावजूद अगर भगदड़ में निर्दोष लोगों की जान चली जाए, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या ऐसी किसी घटना के बाद संबंधित कर्मचारियों को निलंबित कर देने की कार्रवाई काफी है, क्या इसके लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जानी चाहिए!
ऐसा लगता है कि पहले की घटनाओं से न तो शासन-प्रशासन कोई सबक सीख रहा है और न ही आम लोग संयम एवं अनुशासन का परिचय देने की जरूरत महसूस करते हैं। बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि नालंदा की इस घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए गहन जांच की जाएगी और दोषियों को न्याय के कठघरे में लाया जाएगा।
