ताज़ा खबर
 

संपादकीयः शांति विराम

नगालैंड में सुरक्षा बलों पर उग्रवादी हमले बता रहे हैं कि राज्य में अशांति का दौर थमा नहीं है। उग्रवादियों ने पिछले बारह दिनों में दो बार असम राइफल्स के जवानों को निशाना बनाया।

Author June 19, 2018 4:13 AM
असम राइफल्स के वाहन को इसी जगह के आसपास निशाना बनाया गया था। (फोटोः ANI)

नगालैंड में सुरक्षा बलों पर उग्रवादी हमले बता रहे हैं कि राज्य में अशांति का दौर थमा नहीं है। उग्रवादियों ने पिछले बारह दिनों में दो बार असम राइफल्स के जवानों को निशाना बनाया। रविवार को राज्य के मोन जिले में नगा उग्रवादियों के हमले में चार जवान शहीद हो गए। छह जून को भी इसी जिले में नगा उग्रवादियों ने असम राइफल्स के एक शिविर पर धावा बोला था। पिछले महीने की तीन तारीख को मोन जिले के ही चांगलांसू में नगा उग्रवादियों के हमले में असम राइफल्स के आठ जवान शहीद हो गए थे। हिंसा का यह सिलसिला बेहद चिंताजनक है। नगा उग्रवादियों की शुरू से रणनीति घात लगा कर हमले करने की रही है, ताकि अधिक से अधिक संख्या में सुरक्षा बल हताहत हों और उनका मनोबल टूटे। समस्या यह है कि केंद्र के तमाम प्रयासों के बावजूद नगालैंड के उग्रवादी समूह शांति वार्ता को लेकर उत्सुक नहीं हैं। जब वार्ता की बारी आती है तभी ऐसी घटना हो जाती है जिसे आड़ बना कर नगा उग्रवादी संगठन हमलों की रणनीति पर चलने लगते हैं। यही रवैया नगालैंड में शांति की राह में बाधक बना हुआ है। कई बार यह पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी बदअमनी का सबब बन जाता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि नगा संगठनों और केंद्र के बीच शांति वार्ता कब होगी और कैसे चलेगी! क्या दशकों पुरानी इस समस्या का समाधान निकल भी पाएगा? हाल में एक छोटी-सी घटना के बाद ही नगा संगठन बातचीत से बिदक गए। दो जून को सुरक्षा बलों ने नगा संगठनों के समूह- नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी)- की कार्यकारी समिति के नेता के घर पर छापा मारा था। सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई से एनएनपीजी में नाराजगी बढ़ गई और उसने केंद्र के साथ चल रही बातचीत रोक दी। इसके बाद ही असम राइफल्स पर हमले की दो घटनाएं हो गर्इं। केंद्र के साथ नगा संगठनों की वार्ता सात जून को होनी थी। नगा समस्या के स्थायी समाधान के लिए पिछले साल केंद्र सरकार और एनएनपीजी के बीच शांति वार्ता की प्रक्रिया शुरू हुई थी। दोनों पक्षों में सात जून को होने वाली बातचीत इसी शांति वार्ता का हिस्सा थी। नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप में कई नगा संगठन शामिल हैं। इस घटनाक्रम से जिस तरह वार्ता में व्यवधान पड़ा, उससे यह आशंका तो होती ही है कि जो शांति वार्ता साल-भर पहले शुरू हुई थी, वह किसी तार्किक नतीजे तक पहुंच भी पाएगी या नहीं।

शांति वार्ता की प्रक्रिया को झटके इसकी शुरुआत से ही लगते रहे हैं। नगा समस्या दशकों पुरानी है। दूसरी बड़ी वजह यह रही कि नगालैंड में एक नहीं, कई उग्रवादी-अलगाववादी संगठन खड़े हो गए और सभी ने हिंसा का रास्ता अपनाया। हालांकि सबसे पहले नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने केंद्र सरकार के साथ शिलांग समझौता किया था। लेकिन इस समझौते के बाद नए गुट बन गए। नब्बे के दशक के आखिर में केंद्र ने एनएससीएन (इसाक-मुइवा गुट) के साथ और फिर वर्ष 2001 में खापलांग गुट के साथ युद्धविराम पर हस्ताक्षर किए थे। नगा समस्या के समाधान के लिए जरूरी है कि जो भी समझौता हो, वह सभी नगा संगठनों और राज्य की जनता को स्वीकार्य हो, तभी प्रदेश को हिंसा से मुक्ति मिल पाएगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App