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सुरक्षा का पैमाना

पिछले साल जब उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के एक आरोपी भाजपा विधायक संगीत सोम को केंद्र सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई थी तो इस पर काफी विवाद हुआ था। सवाल उठा कि सरकार के इस फैसले के बाद क्या ऐसे ही दूसरे आरोपियों का हौसला नहीं बढ़ेगा और क्या वे अपने […]

पिछले साल जब उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के एक आरोपी भाजपा विधायक संगीत सोम को केंद्र सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई थी तो इस पर काफी विवाद हुआ था। सवाल उठा कि सरकार के इस फैसले के बाद क्या ऐसे ही दूसरे आरोपियों का हौसला नहीं बढ़ेगा और क्या वे अपने लिए इसी स्तर की सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग नहीं करने लगेंगे! यह आशंका सही साबित हुई थी जब मुजफ्फरनगर दंगों के दूसरे आरोपी और उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक और विधायक सुरेश राणा ने अपने ऊपर खतरा बता कर इस सुविधा की मांग कर डाली।

अब केंद्र सरकार ने राणा को भी जेड श्रेणी की सुरक्षा देकर शायद यही बताया है कि भले ही कोई व्यक्ति सांप्रदायिक दंगे जैसे संगीन मामलों का आरोपी हो और फिलहाल जमानत पर जेल से बाहर हो, अगर वह ‘अपने’ खेमे का हो तो उसे सबसे पुख्ता सुरक्षा का घेरा मुहैया कराया जा सकता है! गौरतलब है कि 2013 में मुजफ्फरनगर जिले के एक बड़े हिस्से में फैले सांप्रदायिक दंगे के दौरान संगीत सोम के अलावा सुरेश राणा के खिलाफ भी भड़काऊ भाषण देने और भीड़ को उकसाने आदि आरोपों में कई मुकदमे दर्ज हुए थे और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

उस दंगे में पांच दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए थे। उसका दंश आज भी उस समूचे इलाके और पीड़ितों के बीच देखा जा सकता है। पीड़ितों और दूसरे आम लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने क्या किया? विचित्र है कि उसके दोषियों को सजा दिलाने के लिए कानूनी उपाय करने के बजाय आरोपियों को देश की लगभग सर्वोच्च सुरक्षा-व्यवस्था का घेरा दिया जा रहा है।

किसी व्यक्ति को अति महत्त्वपूर्ण सुरक्षा देने की एक निश्चित प्रक्रिया है। खुफिया एजेंसियां ऐसे व्यक्ति पर खतरे की आशंका का आकलन करती हैं और उसके बाद ही तय किया जाता है कि उसे किस स्तर की सुरक्षा की जरूरत है। लेकिन इस व्यवस्था का व्यावहारिक पहलू क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। सच यह है कि अतिविशिष्ट पैमाने का सुरक्षा घेरा जितना संबंधित व्यक्ति की जान पर जोखिम से बचाव के मद्देनजर होता है, उससे ज्यादा यह राजनीतिक रुतबा बढ़ाने के एक तरीके के तौर पर काम में लाया जा रहा है।

एक आकलन के मुताबिक सर्वोच्च सुरक्षा कवच प्राप्त कम से कम तीस फीसद हस्तियां ऐसी हैं, जिन्हें इस स्तर की सुरक्षा की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर, विशिष्ट कहे जाने वाले लगभग पचास फीसद ऐसे लोग हैं, जिनके लिए हल्की सुरक्षा-व्यवस्था पर्याप्त रहेगी। जेड श्रेणी की सुरक्षा हासिल करने वाले सुरेश राणा पहले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो गंभीर आरोपों में घिरे हैं। इस तरह के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं।

यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस पार्टी से जुड़े कई नेताओं को भी गैरजरूरी ढंग से ऐसा सुरक्षा-बंदोबस्त मुहैया कराने पर सवाल उठे थे। जब भी इस तरह का विवाद उठता है, सरकार की दलील होती है कि खुफिया सूचना के मुताबिक संबंधित व्यक्ति की जान को खतरा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश में कहीं दंगा फैल जाता है, दर्जनों लोग मारे जाते हैं, मगर सरकारों और उनके खुफिया सूत्रों को समय पर कोई जानकारी नहीं मिल पाती और न नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाते हैं।

 

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