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अभिव्यक्ति का कत्ल

बांग्लादेश ‘मुक्ति’ की लड़ाई लड़ कर वजूद में आया था। लेकिन आज वहां के लोग कितने मुक्त हैं, इसका अंदाजा पिछले दिनों की घटनाओं से लगाया जा सकता है। बीते शनिवार को कट्टरपंथियों..

Author नई दिल्ली | November 2, 2015 21:49 pm
ब्लॉगर दास की हत्या, अल कायदा इन इंडियन सबकान्टिनेंट (एक्यूआईएस) द्वारा रॉय पर हुए घातक हमले की जिम्मेदारी लेने के सिर्फ एक हफ्ते बाद हुई है। (तस्वीर में हत्या के विरोध प्रदर्शन करते लोग)

बांग्लादेश ‘मुक्ति’ की लड़ाई लड़ कर वजूद में आया था। लेकिन आज वहां के लोग कितने मुक्त हैं, इसका अंदाजा पिछले दिनों की घटनाओं से लगाया जा सकता है। बीते शनिवार को कट्टरपंथियों ने एक प्रकाशक की हत्या कर दी; उनके हमलों में एक अन्य प्रकाशक और दो ब्लागर गंभीर रूप से घायल हो गए। यही नहीं, रविवार को फिर एक प्रकाशक को जान से मार दिए जाने की धमकी मिली। यह सब कानून-व्यवस्था का कोई सामान्य मामला नहीं है। दरअसल, यह घटनाक्रम बांग्लादेश में कट्टरपंथ के उभार को दर्शाता है और इस ओर भी इशारा करता है कि एक राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश को परिभाषित करने का संघर्ष आज भी जारी है। जिस प्रकाशक की हत्या हुई उन्होंने बांग्लादेश के मशहूर ब्लागर अविजित रॉय की किताब छापी थी।

इसी साल फरवरी में अविजित को अभिव्यक्ति की आजादी की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। कट्टरपंथियों ने उन्हें ढाका में दिनदहाड़े मार डाला, जब वे सपत्नीक पुस्तक मेले से लौट रहे थे। बांग्लादेश में ऐसी घटनाओं का सिलसिला काफी समय से चल रहा है। मगर पहले ऐसे हमले कभी-कभार होते थे, जबकि 2013 से इसमें तेजी आ गई। और इस साल तो यह सिलसिला चरम पर पहुंचा हुआ दिखता है। ताजा घटना से पहले, इस साल चार ब्लागरों की हत्या हो चुकी है। इन अपराधों के पीछे किनका हाथ है यह कोई रहस्य की बात नहीं है, क्योंकि इन हत्याओं की जिम्मेदारी या तो अंसारुल्लाह बांग्ला टीम ने ली है या किसी और कट्टरपंथी संगठन ने। इनके तार अल कायदा से भी जुड़े हैं और जमात-ए-इस्लामी से भी। जिन्होंने जान गंवाई वे सभी मुखर सेक्युलर थे। जिन्हें धमकियां मिल रही हैं वे भी सेक्युलर हैं।

हालांकि बांग्लादेश संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरेपक्ष राष्ट्र है, पर कट््टरपंथी इसे इस्लामी देश बनाना चाहते हैं। इसलिए सेक्युलर बुद्धिजीवी, लेखक-पत्रकार और समाजकर्मी उनके निशाने पर हैं। 1971 के युद्ध अपराधों पर सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के गठन के बाद उदारवादियों और लोकतंत्रवादियों पर कट्टरपंथियों के हमले और तेज हो गए, क्योंकि जमात-ए-इस्लामी के कई प्रमुख लोगों के खिलाफ न्यायाधिकरण ने सजा सुनाई। यों बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार धर्मनिरपेक्षता की तरफदार है, लेकिन कट्टरपंथी गुटों से निपटने में वह ढिलाई बरतती आ रही है।

हिंसा के आरोपियों के साथ-साथ कुछ सेक्युलर ब्लागर और बुद्धिजीवी भी जेल में महज इसलिए डाल दिए गए कि ‘संतुलन’ दिखाई दे और कट्टरपंथियों के एक हिस्से का समर्थन मिल सके। लेकिन इस कमजोरी से अंतत: अवामी लीगको नुकसान ही उठाना पड़ेगा। फरवरी में अविजित राय की हत्या के बाद जिस तरह बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों की लहर आई हुई थी, एक बार फिर वैसा ही नजारा दिख रहा है। वहां ढाका समेत विभिन्न शहरों में हजारों लोगों ने सड़कों पर उतर कर कट््टरपंथियों की बर्बरता के खिलाफ आवाज बुलंद की है। अवामी लीग को मजबूती से इस लड़ाई का साथ देना चाहिए, यही उसके भी और बांग्लादेश के भी हित में होगा। इन घटनाओं में जैसे बांग्लादेश के लिए वैसे ही बाकी दुनिया के लिए भी एक सबक है, कि मजहबी राजनीति आखिरकार नागरिक अधिकारों के लिए खतरा बन जाती है।

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