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संपादकीय: सुराग की खातिर

हालत यह है कि शायद अपनी सीमा को समझते हुए ही पुलिस की ओर से मुख्य आरोपी विकास दुबे के बारे में सूचना देने वाले को ढाई लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की गई है। यानी पुलिस को उम्मीद है कि इनामी रकम की वजह से किसी अन्य स्रोत से मिली सूचना के आधार पर वह विकास दुबे को गिरफ्तार कर सकेगी।

Kanpur, Vikas Dubeyकानपुर एनकाउंटर मामले की जांच के दौरान पुलिस की टीम। (फोटो-सोशल मीडिया)

कानपुर जिले के बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले विकास दुबे को गिरफ्तार करने में पुलिस अब तक नाकाम रही है और अब अन्य स्रोतों के सहारे उस तक पहुंचने की कोशिश शुरू करनी पड़ी है। घटना के दिन ही आसपास के इलाकों को सील करने और अधिकतम सख्ती बरतने का दावा किया गया था, लेकिन पांच दिन बाद भी उसका कोई सुराग नहीं मिला।

जाहिर है, पुलिस के अपने जाल के अलावा राज्य के खुफिया तंत्र को भी अब तक विकास दुबे के बारे में कोई भी जानकारी हासिल करने में कामयाबी नहीं मिल सकी है। यह समूचे ढांचे में एक ऐसी कमी का संकेत है, जिसके रहते अपराध-जगत पर काबू पाने का किसी भी सरकार का दावा महज आधा-अधूरा ही रहेगा।

हालत यह है कि शायद अपनी सीमा को समझते हुए ही पुलिस की ओर से विकास दुबे के बारे में सूचना देने वाले को ढाई लाख रुपए इनाम देने की घोषणा की गई है। यानी पुलिस को उम्मीद है कि इनामी रकम की वजह से किसी अन्य स्रोत से मिली सूचना के आधार पर वह विकास दुबे को गिरफ्तार कर सकेगी।

निश्चित रूप से यह पुलिस के लिए एक असहज स्थिति होगी कि पहले जहां इनाम की यह रकम पचास हजार रुपए थी, बाद में उसमें दो बार इजाफा करके ढाई लाख रुपए किया गया। इनाम घोषित कर किसी अपराधी के बारे में सूचना हासिल करना कानूनी कार्रवाई को कामयाब बनाने की प्रक्रिया का एक हिस्सा जरूर रहा है। लेकिन जिस दौर में समूचे उत्तर प्रदेश में अपराध-जगत के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाने के दावे के बीच मुठभेड़ों में अपराधियों को मार गिराए जाने को ही पुलिस की कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा हो, वैसे में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद विकास दुबे का ‘लापता’ हो जाना क्या समूचे पुलिस और खुफिया तंत्र की नाकामी के रूप में नहीं देखा जाएगा?

इस मामले में एसओ विनय तिवारी सहित और कुछ पुलिसकर्मियों को इस बात के लिए निलंबित किया गया कि घटना के पहले उन्होंने विकास दुबे से फोन पर बातचीत की थी। यानी आशंका यह है कि खुद पुलिस महकमे के कुछ लोगों ने इस कांड में विकास दुबे की राह आसान की थी।

एक ओर, खुद राज्य के मुख्यमंत्री यह दावा करते रहे हैं कि अपराध खिलाफ उनकी सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चलेगी। दूसरी ओर, पिछले दो-ढाई दशक के दौरान विकास दुबे ने आम अपराधों से लेकर थाने में घुस कर हत्या करने जैसे अपने गंभीर अपराधों के जो रिकार्ड कायम किए थे और उसके खिलाफ कम से कम साठ मामले दर्ज थे, उसमें उसे अधिकतम सजा के तहत जेल में होना चाहिए था। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि किन वजहों से उसे हर बार जमानत मिलती रही और वह आजाद घूमता रहा।

हालत यह है कि पिछले हफ्ते की घटना के पहले तक उसका नाम न केवल जिला, बल्कि थाना क्षेत्र तक में अपराधियों की शीर्ष सूची में नहीं था। आखिर उसे किसका संरक्षण मिल रहा था? ऐसी खबरें सामने आ चुकी हैं कि विकास दुबे की पहुंच लगभग हर राजनीतिक दल में रही और खुद भाजपा के कुछ नेताओं से भी उसके अच्छे संपर्क रहे।

शायद इसी तरह के संरक्षण के दम पर उसने अपराध का साम्राज्य खड़ा किया था, जिसमें उसके इलाके में उसकी मर्जी के बिना कुछ भी करना संभव नहीं था। क्या यह सब सरकार और पुलिस की नजर में नहीं था? राजनीतिक संरक्षण से लेकर पुलिसकर्मियों की मिलीभगत तक के तार अगर तथ्य साबित होते हैं तो सरकार या पुलिस किस बूते अपराध और अपराधियों पर काबू पाने का भरोसा जता सकती है?

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