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संपादकीयः कूड़े के पहाड़

दिल्ली में कूड़े के पहाड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल को आड़े हाथों लिया है। सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल से पूछा है कि इन पहाड़ों को हटवाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए!

Author July 14, 2018 3:59 AM
पिछले साल गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे दो लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि यह पहाड़ पिछले कई सालों से खतरे की ओर इशारा कर रहा था।

दिल्ली में कूड़े के पहाड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल को आड़े हाथों लिया है। सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल से पूछा है कि इन पहाड़ों को हटवाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए! आखिर क्या वजह है कि कूड़े के पहाड़ नहीं हट रहे हैं, बल्कि इनकी ऊंचाई बढ़ती जा रही है? अदालत ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए इस बार काफी कड़ा रुख दिखाया है। जाहिर है, दिल्ली में कूड़े के ये पहाड़ जानलेवा बन गए हैं। दो दशक से ज्यादा समय से दिल्ली की जनता कचरे के इन पहाड़ों को झेल रही है। इससे यही लगता है कि पिछले दो दशकों में किसी भी सरकार ने कचरा प्रबंधन के मामले में ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जो शहर को कचरा मुक्त बनाने में सहायक होता। इसी का नतीजा है कि दिल्ली में कूड़े के पहाड़ बनते चले गए। कहा जा सकता है कि कचरा निपटान के मामले में अब तक की सरकारें और प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट इन दिनों दिल्ली में कचरे के निस्तारण के मामले की सुनवाई कर रहा है। लेकिन इस मसले पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल का जो रवैया रहा है, वह खासा हैरान करने वाला है। लंबे समय से दोनों के बीच जिस तरह का प्रशासनिक गतिरोध बना हुआ है, उसकी मार सिर्फ जनता झेल रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि कचरे का निस्तारण करवाना आखिर काम किसका है! यही बात सर्वोच्च अदालत ने भी पूछी है। अदालत को बताया गया कि पिछले डेढ़ साल में उपराज्यपाल ने इस बारे में पच्चीस बैठकें की हैं। लेकिन नतीजा यह निकला कि पिछले डेढ़ साल में कचरे के पहाड़ की ऊंचाई और बढ़ गई है। इस समय गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ की ऊंचाई पैंसठ मीटर हो चुकी है, जो कुतुबमीनार से सिर्फ आठ मीटर कम है। यह गंभीर स्थिति की ओर इशारा है, जिस पर सरकार गंभीर नजर नहीं आती। दिल्ली का कचरा निपटाने के लिए ढाई-तीन दशक पहले गाजीपुर, भलस्वा और ओखला में सेनेटरी लैंडफिल बनाए गए थे। मगर ये कूड़ाघर तय अवधि से पांच साल पहले ही भर गए। उसके बाद ये पहाड़ में तब्दील होने लगे। पिछले एक दशक में अगर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार ने इस समस्या के प्रति गंभीरता दिखाई होती तो शायद कचरे के पहाड़ नहीं खड़े होते। कचरा प्रबंधन के लिए दूरदृष्टि के साथ जो स्थायी और दीर्घ योजना बननी चाहिए थी, वह नहीं बनी।

पिछले साल गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे दो लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि यह पहाड़ पिछले कई सालों से खतरे की ओर इशारा कर रहा था। अब यह दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का बड़ा कारण है। इसके कचरे से निकलने वाली जहरीली गैसें कितनों को बीमार बना चुकी होंगी, इसका कोई हिसाब नहीं है। कचरे के पहाड़ सिर्फ वायु प्रदूषण नहीं फैलाते, बल्कि भूजल को भी प्रदूषित करते हैं। गाजीपुर में इसके कारण पानी भी जहरीला हो गया है। क्या सरकार और उपराज्यपाल इन सबसे अनजान हैं? गाजीपुर में जिस जगह कचरे का पहाड़ खड़ा है उसके आसपास घनी आबादी है। उन लोगों की हालत के बारे में सोचा जाना चाहिए जो दो दशकों से इस पहाड़ से निकलने वाली जहरीली गैसों की सांस ले रहे हैं, कचरे से प्रदूषित जल पी रहे हैं। दिल्ली में सफाई का जिम्मा संभालने वाले नगर निगमों की हालत भी बीमारों जैसी है। निगम पैसा नहीं होने का रोना रोते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं?

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