राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस वर्ष जनवरी के पहले पखवाड़े में आठ सौ से अधिक लोगों के लापता होने की खबरों से जहां लोग भय और चिंता के साथ खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं, वहीं कानून व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली जैसा शहर, जहां सुरक्षा के तमाम आधुनिक इंतजाम होने के दावे किए जाते हैं, वहां अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग लापता हो रहे हैं, तो यह वास्तव में गहरी चिंता का विषय है। सवाल है कि इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेने, उन पर अंकुश लगाने और लोगों के मन में सुरक्षा का भाव एवं भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है?
स्थानीय पुलिस का तो कहना है कि गुमशुदा मामलों के आंकड़ों से लोगों को घबराने या दहशत में आने की जरूरत नहीं है। दलील दी जा रही है कि पिछले वर्ष इसी अवधि के मुकाबले इस बार लापता लोगों की संख्या में कमी आई है। यानी गत वर्ष जनवरी के शुरुआती दो सप्ताह में इससे भी कहीं ज्यादा लोग लापता हुए थे! इससे पुलिस की लापरवाही और असंवेदनशीलता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एक से 15 जनवरी के बीच कुल 807 लोगों की गुमशुदगी के मामले सामने आए। यानी इस दौरान प्रतिदिन औसतन 54 लोग देश की राजधानी से लापता हुए, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और लड़कियां शामिल हैं। पुलिस अधिकारियों का दावा है कि लापता व्यक्तियों से संबंधित सभी शिकायतों को तुरंत दर्ज किया जाता है और उनकी जांच की जाती है।
अगर इन दावों को सच मान भी लिया जाए, तो सवाल यह है कि पुलिस का काम क्या सिर्फ किसी अपराध के बाद अपराधी को पकड़ने का ही है? किसी अपराधी को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस आत्ममुग्ध होकर अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन क्या अपराध होने से पहले ही उसे रोक देने की जिम्मेदारी उसकी नहीं है!
पुलिस का यह कहना कि कुछ लोग पैसों के लिए इस तरह की खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित एवं प्रसारित कर रहे हैं, वास्तव में उसकी व्यवस्थागत खामियों और नाकामियों को ही उजागर करता है, जिसे दुरुस्त किया जाना बेहद जरूरी है।
