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आग के ठिकाने

व्यावसायिक इमारत की चौथी मंजिल पर टिन की छत में कोचिंग कक्षाएं चल रही थीं। उसमें पढ़ रहे बच्चों को भागने का रास्ता नहीं मिला तो वे सीधा कूदने लगे। इस वजह से कई बच्चे अपनी जान से हाथ धो बैठे और कई गंभीर रूप से घायल हो गए।

Author May 27, 2019 1:41 AM
सूरत की एक इमारत में लगी आग और उसमें झुलस कर तेईस से अधिक बच्चों का दम तोड़ देना कई सवाल खड़े करता है।

सूरत की एक इमारत में लगी आग और उसमें झुलस कर तेईस से अधिक बच्चों का दम तोड़ देना कई सवाल खड़े करता है। आग बिजली के ट्रांसफारर्मर के अचानक जल उठने की वजह से लगी। उस व्यावसायिक इमारत की चौथी मंजिल पर टिन की छत में कोचिंग कक्षाएं चल रही थीं। उसमें पढ़ रहे बच्चों को भागने का रास्ता नहीं मिला तो वे सीधा कूदने लगे। इस वजह से कई बच्चे अपनी जान से हाथ धो बैठे और कई गंभीर रूप से घायल हो गए। ज्यादातर बच्चों की जान दम घुटने से गई। ट्रांसफार्मर में लगी आग ने इतनी तेजी से व्यावसायिक इमारत की ऊपरी मंजिलों को अपनी जद में ले लिया कि वहां मौजूद लोग बचाव संबंधी उपायों के बारे में सोच भी नहीं पाए। जिस मंजिल पर कोचिंग कक्षाएं चल रही थीं, वहां से उतरने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां बनी थीं, जो आग में जल कर राख हो गईं और बच्चों को उतरने का कोई रास्ता ही नहीं मिल पाया। देश में ऐसी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं, पर उनसे कोई सबक लेना शायद कभी जरूरी नहीं समझा जाता। कोई बड़ी घटना हो जाने के बाद प्रशासन हरकत में आता है और फिर अपनी गलतियों को ढकने में जुट जाता है।

यह एक आम और जैसे सर्वस्वीकृत प्रवृत्ति बन चुकी है कि सार्वजनिक और व्यावसायिक भवनों में अग्निशमन और आपातकालीन उपायों पर ध्यान देना, उनसे जुड़े नियम-कायदों का पालन करना जरूरी नहीं समझा जाता। इन नियमों का पालन कराने वाला महकमा भी अपनी आंखें मूंदे रखता है। अक्सर बिजली के तारों या फिर ट्रांसफारर्मर से उठने वाली चिनगारी से भयानक हादसे हो जाते हैं। मगर हैरानी की बात है कि उसे लेकर सुरक्षा उपाय नहीं जुटाए जाते। उपहार सिनेमा अग्निकांड के बाद सख्ती बरतते हुए हर भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक और व्यावसायिक भवन में स्वचालित अग्निशमन उपकरण लगाना जरूरी कर दिया गया। मगर भवनों की व्यावसायिक मंजूरी लेने की गरज से भले ऐसे उपाय कर दिए जाते हैं, पर ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि उनके रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता और वे उपकरण सड़ी-गली हालत में बस दिखावे के लिए पड़े रहते हैं। सूरत की जिस इमारत में आग लगी, अगर स्वचालित अग्निशमन व्यवस्था होती, तो इतना बड़ा हादसा शायद न हो पाता। इतने बच्चों की जान चली जाने के बाद प्रशासन सख्ती बरतने का दम भर रहा है, तो उसका क्या फायदा। उसे पहले ही इस मसले पर तत्पर रहना चाहिए था।

निजी व्यावसायिक भवनों में एक प्रवृत्ति यह भी आम है कि उनमें अधिक से अधिक जगह का उपयोग करने की कोशिश की जाती है। इसके चलते निकास आदि के लिए पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं की जाती। इसी प्रवृत्ति का नतीजा है कि छतों आदि का भी अनधिकृत रूप से इस्तेमाल किया जाता है। जिस कोचिंग के बच्चे मारे गए, वह भी इसी तरह चलाई जा रही थी। कोचिंग संस्थानों का चलन पिछले कुछ सालों में इस कदर बढ़ा है कि छोटी से छोटी जगहों, संकरी गलियों, टिन-टप्पर वाली छतों में भी चलाए जाने लगे हैं। चूंकि कोचिंग खोलने के लिए कोई नियम-कायदा नहीं है, किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है, इसलिए सुरक्षा उपायों, सुविधाओं वगैरह की न तो उन पर कोई बंदिश है और न वे खुद इसकी परवाह करते हैं। समझना मुश्किल है कि इस तरह लोगों की जान की कीमत पर क्यों किसी व्यावसायिक गतिविधि को चलते रहने देना चाहिए!

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