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मानसून सत्र: गतिरोध के बीच

संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक के पारित हो पाने की संभावना बिल्कुल नहीं बची है। मगर सरकार को उम्मीद है कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक पर विपक्षी दलों की सहमति हासिल हो सकती है। उसका तर्क है कि इस विधेयक में उन सभी बिंदुओं को दुरुस्त कर लिया गया है, जिन पर विपक्षी दलों को आपत्ति थी।

Author July 22, 2015 8:32 AM
संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक के पारित हो पाने की संभावना बिल्कुल नहीं बची है। (फोटो: एपी)

संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक के पारित हो पाने की संभावना बिल्कुल नहीं बची है। मगर सरकार को उम्मीद है कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक पर विपक्षी दलों की सहमति हासिल हो सकती है। उसका तर्क है कि इस विधेयक में उन सभी बिंदुओं को दुरुस्त कर लिया गया है, जिन पर विपक्षी दलों को आपत्ति थी।

संसद का सत्र सुचारु रूप से चलने देने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई सर्वदलीय बैठक में कुछ दलों ने इस बात पर सकारात्मक रुख दिखाया कि संसद में विचार-विमर्श का माहौल बने रहना चाहिए। इसी से मोदी सरकार को जीएसटी पर सकारात्मक नतीजे की उम्मीद बनी है। इस विधेयक को लोकसभा में मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन राज्यसभा में अटका हुआ है। पर सरकार का यह दावा सही नहीं कहा जा सकता कि जीएसटी विधेयक पूरी तरह दुरुस्त कर लिया गया है।

इसमें वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराज्यीय आवागमन पर राज्यों के लिए एक प्रतिशत कर निर्धारित किया गया है। इस कर का बोझ कंपनियों पर पड़ेगा और आखिरकार उपभोक्ता को इसे भुगतना पड़ेगा। इसी को लेकर कांग्रेस समेत कई दल विरोध कर रहे हैं।

यूपीए सरकार के समय जीएसटी की रूपरेखा तैयार हुई तो भाजपा शासित राज्यों ने इसे मानने से इनकार कर दिया था। गुजरात सरकार की मांग थी कि वस्तुओं और सेवाओं की अंतरराज्यीय आवाजाही पर राज्यों के हिस्से में दो प्रतिशत कर का प्रावधान होना चाहिए। हैरानी की बात नहीं कि केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद उस मांग को जीएसटी विधेयक में शामिल कर लिया गया। बस इसकी सीमा दो से घटा कर एक प्रतिशत कर दी गई।

वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराज्यीय आवागमन का अर्थ है कि अगर कोई कंपनी एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने कच्चे या फिर तैयार माल की ढुलाई कराती है तो उस पर उसे एक प्रतिशत कर चुकाना पड़ेगा। मगर समस्या उन कंपनियों के सामने होगी जिनकी इकाइयां विभिन्न राज्यों में फैली हुई हैं।

अगर वे कोई कच्चा या तैयार माल अपनी ही एक से दूसरी इकाई में भेजती हैं तो उस पर कर भुगतान करना पड़ेगा। कुछ मामलों में ऐसा भी होता है कि कंपनियों को अपने एक ही माल को प्रसंस्करण आदि के लिए दिन में कई बार एक से दूसरी इकाई में भेजने-मंगाने की जरूरत पड़ती है। उस स्थिति में उसे एक ही माल पर कई बार कर चुकाना पड़ेगा।

इस तरह वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ेगी। ऐसे ही सेवाओं के मामले में होगा। सेवा क्षेत्र में लगी कंपनियों को सबसे अधिक एक से दूसरे राज्य में आवाजाही करनी पड़ती है। समझना मुश्किल है कि केंद्रीय कर कानून लागू होने के बाद जब केंद्र सरकार राज्यों को होने वाले नुकसान की पांच साल तक भरपाई करने की जिम्मेदारी उठाने को तैयार है, तो अलग से अंतरराज्यीय आवागमन कर निर्धारित करने की क्या तुक है।

जीएसटी लागू करने के पीछे तर्क है कि पूरे देश में एक तरह की कर प्रणाली होने से वस्तुओं पर उत्पादन लागत घटेगी, विपणन में आसानी होगी और इस तरह वस्तुओं और सेवाओं की कीमत संतुलित की जा सकेगी। अगर प्रस्तावित जीएसटी कानून से यह मकसद पूरा होता नहीं दिख रहा तो उस पर पुनर्विचार से सरकार को क्यों गुरेज होनी चाहिए।

 

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