देश भर में हर साल मानसून का बेसब्री से इंतजार किया जाता है, क्योंकि कृषि, पेयजल, ऊर्जा और गर्मी से राहत के दृष्टिकोण से इसे जीवन का आधार माना जाता है। मगर जब मानसून भारी बारिश के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, तो जीवन की रफ्तार थम जाती है। मैदानों में सड़कों पर जलभराव से यातायात ठप हो जाता है और बाढ़ की वजह से कई लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं।

वहीं, पहाड़ों पर भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं कई जिंदगियों को लील लेती हैं। शासन-प्रशासन की ओर से इसे प्राकृतिक आपदा का नाम दिया जाता है, लेकिन असल में इसके लिए काफी हद तक मानव-निर्मित परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं। इस बार भी मानसून को आए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं और जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक बाढ़, भूस्खलन तथा जलभराव का सिलसिला शुरू हो गया है।

केरल के वायनाड में बीते मंगलवार को हुए भूस्खलन में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि पांच अभी तक लापता हैं। मुंबई पहले से ही भारी बरसात से बेहाल है और बुधवार को बारिश से दिल्ली का भी यही हाल हो गया।

देश में मानसून के दौरान होने वाले जान-माल के नुकसान की एक बड़ी वजह खराब बुनियादी ढांचे, अनियोजित शहरीकरण, जलनिकासी की माकूल व्यवस्था न होना, अवैज्ञानिक एवं अवैध तरीके से खनन और वनों की अंधाधुंध कटाई है। भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण हर साल सैकड़ों जानें जाती हैं और करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट हो जाती है।

मैदानी इलाकों में महानगरों से लेकर छोटे शहरों में ढांचागत विस्तार तो हो रहा है, लेकिन मुख्य रूप से जल निकासी की व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाता है। हर साल बरसात से पहले नालियों की साफ-सफाई के लिए विशेष अभियान शुरू किए जाते हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन ज्यादातर सरकारी कागजों तक ही सीमित रहता है। इसी का नतीजा है कि दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र और गुजरात तक इन दिनों लोगों को जलभराव एवं बाढ़ की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

अक्सर यह देखा जाता है कि इस तरह की आपदा के बाद प्रशासन की ओर से जोर-शोर से राहत कार्य शुरू किए जाते हैं, लेकिन यही सतर्कता और गंभीरता अगर बरसात से पहले दिखाई जाए, तो नुकसान को निश्चित तौर पर कम किया जा सकता है।

भू-विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्रों और पश्चिमी घाटों में अंधाधुंध खनन, वनों की कटाई तथा अनियंत्रित ढांचागत निर्माण के कारण मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है। इसी कारण भारी बारिश और बादल फटने से पहाड़ दरक रहे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो रहा है। केरल के वायनाड में भूस्खलन की घटना इसका ताजा उदाहरण है। खबरों के मुताबिक, इस जगह एक सुरंग निर्माणाधीन है और पहाड़ी से निकाली गई मिट्टी भी पास में ही डाली गई थी। भारी बारिश से पहाड़ी का एक हिस्सा टूटकर मलबे के साथ नीचे आ गया।

इसी कारण अब परियोजना कंपनी के कार्य पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसमें दोराय नहीं कि जलवायु परिवर्तन के कारण हाल के वर्षों में मौसम का मिजाज काफी बदल गया है। कभी सूखा, तो कभी बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश से हालात भयावह हो जाते हैं। मगर यह भी सच है कि अगर समय रहते व्यवस्थित तरीके से तैयारी कर ली जाए, तो समस्याओं और नुकसान से काफी हद तक बचा जा सकता है।