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मॉनसून के भरोसे

मौसम विभाग ने कहा है कि इस साल एक जून से तीस सितंबर तक औसतन एक सौ छह फीसद बारिश की संभावना है। इस पूर्वानुमान में जहां देश के ज्यादातर हिस्से के लिए खुशखबरी है

Author नई दिल्ली | April 14, 2016 2:29 AM
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के सात जून तक केरल में पहुंचने की उम्मीद है।। (फाइल फोटो)

पिछले दो साल से लगातार भीषण सूखे की मार झेल रहे देश के लिए इस बार सामान्य से अधिक बारिश का पूर्वानुमान एक बड़ी राहत लेकर आया है। अगर यह सही साबित होता है तो निश्चित ही खेती से लेकर उद्योग जगत और समूची अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित होगा। इन दिनों मुल्क के दस राज्य जबर्दस्त सूखे की चपेट में हैं। वहां नदियां सूखी हैं, जलाशय रीत गए हैं। जहां थोड़ा-बहुतपानी है भी, उस पर सशस्त्र पहरा है। ऐसे विकट हालात के बीच मौसम विभाग ने कहा है कि इस साल एक जून से तीस सितंबर तक औसतन एक सौ छह फीसद बारिश की संभावना है। इस पूर्वानुमान में जहां देश के ज्यादातर हिस्से के लिए खुशखबरी है वहीं पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में कम बारिश की आशंका है। इसके साथ ही मॉनसून से पहले यानी अप्रैल, मई और जून में औसत से ज्यादा गरमी पड़ने की बात कही गई है। नतीजतन, तेज हवाओं के साथ चलने वाली लू के थपेड़ों से दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मराठवाड़ा, विदर्भ और तटीय आंध्र प्रदेश के बेहाल होने की संभावना है, जो इस साल अप्रैल में ही तापमान छियालीस डिग्री के पास पहुंचने से सही साबित होती लग रही है। हालत यह है कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में सौ से ज्यादा लोग लू की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं। क्या अच्छे मानसून के पूर्वानुमान के मुदित माहौल में हमें भीषण गर्मी के संकट से निपटने की चुनौती का भी खयाल रखते हुए तदनुरूप तैयारी नहीं करनी चाहिए!

अफसोस की बात है कि इस चुनौती की तरफ से केंद्र और राज्य सरकारें आंखें मूंदे हैं और अच्छे मॉनसून के पूर्वानुमान पर, जो अनेक बार गलत भी साबित होते रहे हैं, गद्गद दिखाई दे रही हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने तो इससे खाद्यान्न की पैदावार में वृद्धि की भविष्यवाणी भी कर डाली, जबकि कौन नहीं जानता कि ज्यादा बारिश कई बार फसलों की बर्बादी का सबब भी बन जाती है। दरअसल, हमें नहीं भूलना चाहिए कि मानसून का यह पूर्वानुमान शुरुआती है, मौसम विभाग दूसरा पूर्वानुमान आगामी जून में लगाएगा, जिसके वास्तविकता के ज्यादा करीब होने की संभावना है। सवाल यह भी है कि हम अपनी कृषि या अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए मौसम के पूर्वानुमानों के मोहताज क्यों हैं, जबकि हमें हर संकट से निपटने की तैयारियों से पहले ही लैस रहना चाहिए। अगर हम मानसून के मुखापेक्षी बने हुए हैं तो इसके लिए हमारा दोषपूर्ण जल प्रबंधन भी कम जिम्मेदार नहीं है। आजादी के लगभग सात दशक बीतने के बावजूद देश में कारगर जल नीति बना कर उस पर अमल सुनिश्चत नहीं किया जा सका है। महज पानी के लिए लोग बड़ी संख्या में पलायन करने को मजबूर हैं। पानी की बरबादी रोकने, वर्षाजल और जल स्रोतों को सहेजने, भूजल का अंधाधुध दोहन रोकने, कथित विकास केलिए वनों की बलि रोकने आदि की तरफ अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। इस दिशा में जो भी उपाय किए गए वे गैरसरकारी स्तर पर ही ज्यादा हुए हैं, जबकि जरूरत जल के लिए व्यापक जनांदोलन की है। एक ऐसा आंदोलन जो जल प्रबंधन, शोधन, संरक्षण को सरकार से लेकर समाज तक हमारे रोजमर्रा जीवन का सरोकार बनाए। इसके अभाव में केवल अच्छे मानसून की आस में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना हमें आत्मघात की ओर ही ले जाएगा।

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