निगरानी का तंत्र

वक्त के साथ अभिव्यक्ति के माध्यमों और मंचों का विस्तार जिस रफ्तार से हुआ है, उसे एक तरह से सूचनाओं के प्रसार में लोकतंत्र के मजबूत होने तौर पर देखा गया।

सांकेतिक फोटो।

वक्त के साथ अभिव्यक्ति के माध्यमों और मंचों का विस्तार जिस रफ्तार से हुआ है, उसे एक तरह से सूचनाओं के प्रसार में लोकतंत्र के मजबूत होने तौर पर देखा गया। खासकर डिजिटल मीडिया अपने विशेष प्रभाव के साथ सामने आया। एक ओर इसके कई सकारात्मक पहलू उभरे, तो वहीं कई स्तरों पर जिस तरह की बातों का निर्बाध प्रचार-प्रसार हुआ और उनका जैसा असर देखा गया, उसमें इस बात की जरूरत महसूस की गई कि इन माध्यमों पर नजर रखना खुद इनके ही हित में होगा। पिछले काफी समय से इस संदर्भ में कुछ सवालों के समांतर डिजिटल मीडिया पर निगरानी के लिए एक तंत्र बनाने की बात भी उठती रही है।

इसी के मद्देनजर संसद की एक समिति ने इस मसले पर सरकार को यह सुझाव दिया है कि वह सभी पक्षों के साथ परामर्श करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह से संरक्षित रखते हुए डिजिटल मीडिया पर निगरानी के लिए एक सशक्त प्रणाली तैयार करे। यह सुझाव इस परिप्रेक्ष्य में आया है कि डिजिटल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर अगर कभी किसी संवेदनशील घटनाओं या मामलों की बेलगाम प्रस्तुति अवांछित असर के रूप में सामने आती है, तो उसे निगरानी के दायरे में लाने की जरूरत है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि अगर सरकार इस सुझाव पर कोई नीतिगत फैसला लेती है, तो वह डिजिटल मीडिया पर निगरानी के बजाय नियंत्रण के रूप में तब्दील न हो।

सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति की ‘मीडिया कवरेज में नैतिक मानक’ विषय पर लोकसभा में पेश रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत में प्रेस के मानक को बनाए रखने और उसे बढ़ावा देने के लिए पीसीआइ यानी भारतीय प्रेस परिषद के जरिए सेंसर किए गए मामलों पर कार्रवाई करने के मकसद से ब्यूरो आफ आउटरीच ऐंड कम्युनिकेशन के लिए कोई समय सीमा निर्धारित करे।

समिति ने इस बात पर क्षोभ जाहिर किया कि ऐसे कई मामलों में दोषी मीडिया संस्थान पीसीआइ की ओर से सेंसर किए जाने के बाद भी वही गलतियां दोहराते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि समाचारों या सूचनाओं के प्रसार के माध्यमों के विस्तार ने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूती दी है। लेकिन इसके समांतर किसी निगरानी तंत्र के न होने की वजह से इसमें कुछ अवांछित गतिविधियां भी अपने नकारात्मक असर के साथ सामने आर्इं। खासकर सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के मंचों पर अनेक घटनाओं या मामलों की प्रस्तुतियों ने जनता के एक बड़े वर्ग के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की।

स्वाभाविक रूप से जब लोगों ने थोड़ा ठहर कर डिजिटल मीडिया के ऐसे रुख पर विचार किया, तो उनके भीतर इनके प्रति विश्वास में कमी आई। समिति ने भी इस पहलू पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि यह गंभीर विचार का विषय है कि जो मीडिया कभी लोकतंत्र में नागरिकों के हाथों में सबसे भरोसेमंद हथियार था और जनता के न्यासी के रूप में कार्य करता रहा, वह धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा खो रहा है; पेड न्यूज, फर्जी खबर, टीआरपी में हेराफेरी, मीडिया ट्रायल, सनसनी फैलाने, पक्षपात रिपोर्र्टिंग आदि ने इस पर सवालिया निशान लगाया है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि मीडिया का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव जिस रूप में सामने आया है, उसमें उसका कोई भी माध्यम जब तक जिम्मेदारी के साथ काम करता है, तभी तक लोकतंत्र सुरक्षित है।

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