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संपादकीयः पेशकश के पीछे

कश्मीर संकट को सुलझाने के लिए ‘रचनात्मक भूमिका’ निभाने की चीन की पेशकश पर भारत की तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। भारत ने चीन की पेशकश को दो टूक नामंजूर करते हुए अपने पुराने रुख को एक बार फिर दोहराया है।

Eid, Eid 2017, Srinagar, Kashmir, Jammu Kashmir, Mehbooba Mufti, Stone Pelter, Kashmir Violence, Jansatta, Kashmir Newsकश्मीर में पाकिस्तान झंडे फहराता युवक।

कश्मीर संकट को सुलझाने के लिए ‘रचनात्मक भूमिका’ निभाने की चीन की पेशकश पर भारत की तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। भारत ने चीन की पेशकश को दो टूक नामंजूर करते हुए अपने पुराने रुख को एक बार फिर दोहराया है। भारत ने कहा है कि संकट का एकमात्र कारण सीमापार का आतंकवाद है, जो न सिर्फ नियंत्रण रेखा पर और कश्मीर में बल्कि इस पूरे क्षेत्र में शांति और स्थायित्व के लिए खतरा बना हुआ है। भारत का जवाब उसकी कश्मीर नीति के सर्वथा अनुरूप है, लेकिन चीन ने ऐसा प्रस्ताव क्यों रखा यह कई कारणों से हैरतनाक लग सकता है। कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ऐसी ही पेशकश की गई थी। उसे भी भारत ने फौरन ठुकरा दिया था। मान लिया गया कि ट्रंप कई बार जिस तरह बिना आगा-पीछा सोचे कोई टिप्पणी कर देते हैं, उसी तरह उन्होंने यह भी कह दिया होगा। फिर, हाल में वाइट हाउस में ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई। तब ट्रंप ने मध्यस्थता के लिए इच्छुक होने का कोई संकेत नहीं दिया, बल्कि मोदी के साथ मुलाकात से पहले ही ट्रंप प्रशासन ने हिजबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद््दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर यही जताया कि पाकिस्तान की जमीन से चलने वाली आतंकी गतिविधियां कतई स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन चीन क्यों कश्मीर मामले में पंच बनने को इच्छुक है, जिसके साथ भारत के रिश्ते सौहार्दपूर्ण तो क्या इन दिनों सामान्य भी नहीं हैं?

अरुणाचल प्रदेश पर जब-तब अपना दावा जता कर चीन भारत का दिल दुखाता ही रहता है, कुछ समय से डोकलाम को लेकर दोनों देशों के बीच तनातनी चल रही है। इन्हीं दिनों कश्मीर पर तथाकथित रचनात्मक भूमिका की पेशकश करने का क्या मतलब हो सकता है? कूटनीतिक चाल अक्सर सीधी भाषा में नहीं चली जाती। तो क्या पेशकश के पीछे चीन की मंशा भारत की दुखती रग पर उंगली रखने की रही होगी? क्या वह जताना चाहता होगा कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय मसला है? क्या कश्मीरियों को, या पाकिस्तान को कोई संदेश देना चाहता होगा? जो हो, कश्मीर को लेकर चीन का रुख क्या रहा है यह इसी से समझा जा सकता है कि अरुणाचल प्रदेश की तरह कश्मीर के लोगों के लिए भी वह सामान्य नहीं, स्टेपल वीजा जारी करता रहा है। कश्मीर के प्रति जिस देश का रुख भारत के लिए चिंताजनक हो, और खुद जिसके साथ भारत का दशकों से सीमा विवाद चल रहा हो, वह मध्यस्थता की पेशकश करे, इससे विचित्र बात और क्या हो सकती है? पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की तरफ से आए बयान के जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिए तैयार है। इसमें कुछ नया नहीं है।

वाजपेयी सरकार के समय पाकिस्तान के साथ हुई समग्र वार्ता के एजेंडे में सरक्रीक, सियाचिन, कश्मीर जैसे बेहद संवेदनशील मुद््दे भी शामिल थे। फिर, मनमोहन सिंह सरकार के दौर में चली वार्ताओं में भी ये मुद्दे एजेंडे में शामिल रहते थे। अलबत्ता भारत इस पर जोर देता रहा कि पहले आतंकवाद के खात्मे और आपसी व्यापार को बढ़ाने जैसे गैर-विवादास्पद मुद्दों पर बातचीत हो, संवेदनशील मसलों पर बाद में। पाकिस्तान से बातचीत की रजामंदी बताने के साथ ही भारत ने यह भी कहा है कि मूल समस्या सीमापार का आतंकवाद है। लेकिन हम चीन से इस मामले में क्या उम्मीद कर सकते हैं, जिसने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदी लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाए गए भारत के प्रस्ताव पर हर बार पानी फेर दिया?

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