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जश्न और जज्बा

सरकार को खासकर विकास के मामले में गंभीरता पूर्वक ध्यान देने की जरूरत है। विकास का मतलब सिर्फ कुछ कंपनियों को औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए प्रोत्साहित करना या फिर उनके लिए अनुकूल माहौल तैयार कर देना नहीं है।

Author नई दिल्ली | Updated: May 30, 2016 6:18 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर जितने बड़े पैमाने पर जश्न मनाया, वैसा शायद ही किसी सरकार ने मनाया हो। इंडिया गेट पर आयोजित समारोह में न सिर्फ सरकार और पार्टी से जुड़े लोगों ने सरकार की उपलब्धियां गिनार्इं, बल्कि उसमें फिल्मी दुनिया और दूसरे क्षेत्रों की हस्तियों ने भी शिरकत की। दूरदर्शन पर पांच घंटे का विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया गया। अपनी उपलब्धियों और कामकाज के बारे में लोगों तक सूचनाएं पहुंचाना सरकार का दायित्व है, पर उसका तरीका क्या हो, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत होती है। नरेंद्र मोदी अपने कामकाज के प्रचार को लेकर शायद अब तक के सबसे मुखर प्रधानमंत्री हैं। इसलिए सरकार के दो साल पूरे होने पर ऐसे समारोह का आयोजन हैरान करने वाला नहीं था। मगर अब मोदी सरकार के लिए गंभीरता से सोचने का समय है कि क्या सचमुच वह सब कुछ हुआ है या हो रहा है, जिसका वादा उसने लोकसभा चुनावों के समय और सरकार बनने के बाद किया था।

विकास का मुद्दा मोदी सरकार की प्राथमिकता है। इसके लिए कई योजनाएं बनीं, फैसले हुए, मगर मूल्यांकन करने की जरूरत है कि क्या वास्तव में उसके मुताबिक नतीजे आए हैं। हालांकि किसी बड़े बदलाव के लिए दो साल का वक्त पर्याप्त नहीं होता, कई योजनाओं के नतीजे लंबे समय बाद पता चलते हैं, पर इतने समय में सरकार के कामकाज की गति का अंदाजा तो लग ही जाता है। तमाम एजंसियों ने विभिन्न मुद्दों पर सर्वेक्षण कराए, जिनसे मोदी सरकार के कामकाज का पता चलता है। सरकार को उन तमाम बिंदुओं पर तफ्सील से विचार करने और उसके अनुसार आगे बढ़ने की जरूरत है।

सरकार को खासकर विकास के मामले में गंभीरता पूर्वक ध्यान देने की जरूरत है। विकास का मतलब सिर्फ कुछ कंपनियों को औद्योगिक इकाइयां लगाने के लिए प्रोत्साहित करना या फिर उनके लिए अनुकूल माहौल तैयार कर देना नहीं है। प्रधानमंत्री ने बहुत सारे देशों की यात्रा की और वहां रह रहे भारतीयों को निवेश के लिए आमंत्रित किया, मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसी योजनाएं शुरू कीं, मगर हकीकत यह है कि अपेक्षित विदेशी निवेश आकर्षित नहीं हो पा रहा। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उसकी खपत के लिए बाजार तलाशना भी जरूरी है, मगर निर्यात के मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं दिख रही। जीडीपी में अनेक क्षेत्रों का योगदान घटा है। छोटे और मंझोले उद्योगों की स्थिति में सुधार की कोई सूरत नजर नहीं आ रही। यही वजह है कि नए रोजगार पैदा करने के मामले में मोदी सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

महंगाई के मोर्चे पर भी थोक मूल्य सूचकांक में भले कुछ राहत दर्ज दिख रही हो, पर खुदरा बाजार में उपभोक्ता के माथे पर शिकन बरकरार है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई उत्साहजनक प्रयास नजर नहीं आता। किसानों की दशा जस की तस बनी हुई है। इसलिए अभी तक सरकार की उपलब्धियां बड़े-बड़े नारे देने तक अधिक सिमटी हुई हैं। उन्हें व्यावहारिक धरातल पर साकार करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री बारबार पिछली सरकार की नाकामियों का उल्लेख करते रहे हैं, पर उन्हें यह भी देखने की जरूरत है कि राजनीतिक स्तर पर उनके लिए जो अवरोध उनके ही आनुषंगिक संगठनों की तरफ से खड़े किए जा रहे हैं, उनसे कैसे पार पाया जा सकता है।

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