देश भर में हर साल बड़ी संख्या में लोग लापता हो जाते हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चे, महिलाएं और लड़कियां शामिल होती हैं। इस वर्ष जनवरी के पहले पखवाड़े में दिल्ली से आठ सौ से अधिक लोगों के लापता होने की खबरों ने इस मसले की गंभीरता को फिर से उजागर किया है। मगर हैरत की बात है कि इस आपराधिक समस्या से निपटने के लिए अब तक राष्ट्रीय स्तर पर कोई एकीकृत प्रयास होते नजर नहीं आए हैं। यहां तक कि लापता होने की घटनाएं और उनमें से कितने लोगों को ढूंढ़ लिया गया तथा ऐसे मामलों के पीछे किसका हाथ था, इसका एकीकृत राज्यवार ब्योरा भी मुश्किल से दर्ज हो पाता है।
यही वजह है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने मंगलवार को इस मसले पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह इस बात का पता लगाए कि देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के लापता होने की घटनाओं के पीछे किसी देशव्यापी गिरोह या राज्य-विशिष्ट समूह का हाथ तो नहीं है। इसके लिए तमाम राज्यों से ऐसे मामलों की संख्या और कार्रवाई का ब्योरा संकलित कर उनका विश्लेषण करने का निर्देश भी दिया गया है।
गौरतलब है कि देश भर में बच्चों की गुमशुदगी के मामलों से संबंधित आंकड़ों के संकलन के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से एक पोर्टल बनाया गया है, जिस पर सभी राज्य ऐसी घटनाओं का ब्योरा दर्ज करा सकते हैं। मगर, इस प्रक्रिया में भी सरकारी तंत्र की उदासीनता साफ देखी जा सकती है। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में खुद यह बात स्वीकार की है कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और उनसे संबंधित अभियोजन से जुड़े आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए हैं।
दरअसल, पिछले वर्ष दिसंबर में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को लापता बच्चों के सिलसिले में छह साल के राष्ट्रव्यापी आंकड़े उपलब्ध कराने और ऐसे आंकड़ों के संकलन में राज्यों के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करने को कहा था। इससे पहले राज्यों को बच्चों की गुमशुदगी के मामलों की निगरानी के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति का निर्देश भी दिया गया था। इसके बावजूद अगर राज्यों की ओर से संबंधित ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है, तो इससे सरकारी तंत्र में व्यवस्थागत खामियों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
इसमें दोराय नहीं कि देश की राजधानी दिल्ली समेत विभिन्न राज्यों में विशेषकर बच्चों, महिलाओं और लड़कियों के लापता होने की घटनाएं जितनी बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं, उससे इस आशंका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि इसके पीछे देशव्यापी या राज्य स्तरीय गिरोहों का हाथ हो सकता है। इसलिए इस बात की गहन जांच-पड़ताल जरूरी है कि लापता होने की ज्यादातर घटनाओं में किसी तरह कोई समानता तो नहीं है! मगर यह तभी संभव होगा, जब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों से जुड़े आंकड़ों का संकलन हो पाएगा।
इस मसले की गंभीरता का अंदाजा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रपट से लगाया जा सकता है, जिसके मुताबिक, वर्ष 2023 में देश भर में आठ लाख से ज्यादा लोग लापता हुए थे। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है। ऐसे में जरूरी है कि हर राज्य अपनी जिम्मेदारी को समझे और लापता होने के मामलों में तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अगर कहीं कोई लापरवाही बरती जाती है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, ताकि व्यवस्था में आम लोगों का भरोसा कायम रह सके।
