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संपादकीय: इलाज और सवाल

स्वास्थ्य मंत्रालय और आइसीएमआर ने स्पष्ट किया कि प्लाज्मा से उपचार अभी सिर्फ प्रयोग के चरण में है और इस बात का अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है कि कोरोना मरीजों को इससे ठीक किया जा सकता है, ऐसे में इस तरीके से इलाज करना जोखिम भरा होगा।

Author Published on: April 30, 2020 5:43 AM
प्लाज्मा से उपचार कितना कारगर है, यह भी परीक्षण के दौर में है।

पिछले हफ्ते जब पहली बार यह बात सामने आई थी कि प्लाज्मा उपचार विधि से कोरोना संक्रमितों के इलाज का रास्ता निकल सकता है और परीक्षण के दौरान इसमें कुछ सफलता मिली भी है, तब लगा था कि अब इस महामारी का कोई तोड़ निकल आएगा। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) सहित कुछ अस्पतालों में कोरोना संक्रमितों का प्लाज्मा विधि से इलाज करके देखा जा रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने तो बाकायदा कहा भी था कि कोरोना के इलाज में प्लाज्मा से इलाज कारगर है और इसके शुरुआती नतीजे अच्छे आए हैं। इस सफलता को देख कर कुछ और राज्यों में इसी तरह की पहल हुई और कई राज्यों ने प्लाज्मा विधि से इलाज शुरू करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) से अनुमति मांगी। लेकिन इस प्रयास को मंगलवार को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब केंद्र सरकार ने प्लाज्मा विधि से इलाज करने पर रोक लगा दी।

स्वास्थ्य मंत्रालय और आइसीएमआर ने स्पष्ट किया कि प्लाज्मा से उपचार अभी सिर्फ प्रयोग के चरण में है और इस बात का अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है कि कोरोना मरीजों को इससे ठीक किया जा सकता है, ऐसे में इस तरीके से इलाज करना जोखिम भरा होगा।

कोरोना का इलाज खोजने के लिए पूरी दुनिया में वैज्ञानिक और चिकित्सक दिन-रात जुटे हैं। कहीं टीबी, एड्स की दवाओं से मरीजों को ठीक करने का दावा किया जा रहा है, तो अमेरिका और यूरोपीय देशों में बड़ी संख्या में मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन देकर देखा गया। लेकिन अभी तक कोई भी ऐसी दवा सामने नहीं आई है जिसे कोरोना के इलाज के लिए पूरी तरह से कारगर माना जा सके। प्लाज्मा से इलाज भी कई प्रयोगों में से एक है और इसे दिल्ली में लिवर एवं यकृत विज्ञान संस्थान (आइएलबीएस) की निगरानी में शुरू किया गया है।

जाहिर है, जिस दिशा में भी बढ़ा गया, सोच-समझ कर ही कदम रखे गए होंगे। आइएलबीएस देश का एक बड़ा और प्रतिष्ठित चिकित्सा केंद्र है, इसलिए उसके किसी प्रयोग को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लखनऊ के कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी प्लाज्मा उपचार विधि का प्रयोग शुरू हुआ। इसलिए सवाल यह उठता है कि अगर प्लाज्मा विधि से लोग ठीक हो रहे हैं, तो क्यों नहीं गंभीर मरीजों पर इसे आजमाया जाना चाहिए।

प्लाज्मा से इलाज को लेकर आइसीएमआर ने जिस बड़े खतरे से आगाह किया है, वह अपनी जगह सही है। किसी भी मरीज को खून या प्लाज्मा देना खतरे से खाली नहीं होता और अन्य घातक संक्रमणों का खतरा खड़ा हो सकता है। आइसीएमआर का कहना है कि इस विधि की अपनी सीमाएं हैं और सबसे महत्त्वपूर्ण बात प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी की मात्रा और उसकी गुणवत्ता है। आइसीएमआर की चिंताएं अपनी जगह वाजिब हैं।

भले आइसीएमआर प्लाज्मा विधि के प्रयोग के मानदंडों को और कड़े बना दे, लेकिन इसे प्रायोगिक स्तर पर ही रखते हुए इसका दायरा बढ़ाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। अगर बड़े पैमाने पर लोगों के ठीक होने के संकेत मिलते हैं तो यह भी बड़ी कामयाबी होगी। कोरोना संक्रमितों में बीमारी की गंभीरता का स्तर अलग-अलग पाया जा रहा है। जिनकी हालत गंभीर नहीं है, उनमें ठीक होने की दर भी बढ़ रही है। इस सिलसिले को और आगे बढ़ाने के मकसद से होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी आदि दूसरी चिकित्सा पद्धतियों को अपनाने पर भी सोचा जा सकता है।

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