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संपादकीयः स्वच्छता का संदेश

कुछ साल पहले तक देश के अलग-अलग इलाकों के अध्ययन का एक विषय यह भी होता था कि सबसे ज्यादा गंदगी किस शहर में है।

Author October 4, 2018 2:38 AM
स्वच्छता अभियान खुले में शौच की समस्या के समाधान से लेकर आसपास की जगहों को साफ-सुथरा रखने को लक्षित जरूर है, लेकिन इससे आगे यह लोगों के जीवन में सफाई को एक संस्कृति के रूप में शामिल करने की कोशिश है।

कुछ साल पहले तक देश के अलग-अलग इलाकों के अध्ययन का एक विषय यह भी होता था कि सबसे ज्यादा गंदगी किस शहर में है। लेकिन अब अगर यह देखा जाने लगा है कि शहरों-महानगरों से लेकर गांवों तक में स्वच्छता की कसौटी पर कितने काम हुए हैं और लोगों की जीवनशैली में कितना बदलाव आया है तो इसका श्रेय भारत सरकार की ओर से शुरू किए गए स्वच्छता अभियान को जाता है। इसके पीछे महात्मा गांधी के स्वच्छता मिशन की प्रेरणा है। इसे मंगलवार को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भी दर्ज किया। निश्चित रूप से स्वच्छता की कसौटी पर समूचे देश में दर्ज किए जाने लायक कामयाबी तक पहुंचना अभी दूर है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ सालों के दौरान आम लोगों के बीच स्वच्छता आपसी बातचीत का एक विषय बना है। जिन लोगों के लिए आसपास फैली गंदगी गौर करने लायक कोई समस्या नहीं थी, बल्कि आमतौर पर किसी न किसी रूप में वे खुद भी इस स्थिति को पैदा करने में शामिल होते थे, वहीं अब वे इस मसले पर सोचने लगे हैं। इसे स्वच्छता की ओर बढ़े कदमों का सकारात्मक हासिल कहा जा सकता है।

ऐसे दृश्य आम हैं जिनमें कोई पढ़ा-लिखा और आधुनिक दिखने वाला व्यक्ति घर से बाहर कुछ खाकर उसके पैकेट या बचा हुआ हिस्सा सड़क पर फेंकते या फिर पान-गुटखा चबा कर कहीं भी थूकते हुए शायद एक पल के लिए भी नहीं सोचता कि उसकी यह आदत गंदगी फैलाने में क्या भूमिका निभाता है। यही नहीं, गली-मुहल्लों में अपने घर को साफ करने के बाद निकले कचरे को नालियों में गिरा देना मानो लोग अपना अधिकार समझते हैं। जबकि इस मामूली-सी दिखने वाली आदत की वजह से बरसात या फिर आम दिनों में भी नालियां या बड़े नाले जाम हो जाते हैं और पानी निकल कर सड़क और गलियों में फैल जाता है। विडबंना यह है कि इससे फैलने वाली बीमारी के खतरों के जानते-समझते हुए भी लोग अपनी आदतों में सुधार करने की कोशिश नहीं करते। लगभग सभी लोग किसी कचरे के ढेर और उसकी सड़ांध के आसपास से गुजरते हुए उसकी बदबू तक से बचना चाहते हैं, लेकिन इस हालत में अपनी भूमिका पर विचार नहीं करना चाहते।

दरअसल, स्वच्छता अभियान खुले में शौच की समस्या के समाधान से लेकर आसपास की जगहों को साफ-सुथरा रखने को लक्षित जरूर है, लेकिन इससे आगे यह लोगों के जीवन में सफाई को एक संस्कृति के रूप में शामिल करने की कोशिश है। यह सही है कि कहीं भी सफाई की जिम्मेदारी नगर निगमों और दूसरे संबंधित महकमों की है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत की गई तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी कई तरह की बाधाओं की वजह से खुले में शौच की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में आज भी बीस हजार पांच सौ से ज्यादा लोग सिर पर मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं। बड़े नालों या सीवर की सफाई के लिए उसमें मजदूरों को उतारने के बजाय अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन क्या इन सबका मतलब यह हो जाता है कि आम लोगों की जिम्मेदारी सिर्फ गंदगी फैलाने तक सीमित है? दरअसल, यह नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी और समझ का मामला है। आसपास की जगहों को साफ रखने को अपनी आदत में शुमार किए बिना स्वच्छता की ओर बढ़े कदम अधूरे साबित हो सकते हैं।

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