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संपादकीयः तलाशी का रास्ता

जम्मू-कश्मीर में बढ़ती आतंकी घटनाओं के मद्देनजर घाटी के बीस गांवों में चलाए गए तलाशी अभियान से चरमपंथियों के मंसूबे कुछ कमजोर होने की उम्मीद जताई जा रही है।

Author May 6, 2017 03:20 am
जम्मू-कश्मीर में बढ़ती आतंकी घटनाओं के मद्देनजर घाटी के बीस गांवों में चलाए गए तलाशी अभियान से चरमपंथियों के मंसूबे कुछ कमजोर होने की उम्मीद जताई जा रही है।

जम्मू-कश्मीर में बढ़ती आतंकी घटनाओं के मद्देनजर घाटी के बीस गांवों में चलाए गए तलाशी अभियान से चरमपंथियों के मंसूबे कुछ कमजोर होने की उम्मीद जताई जा रही है। नब्बे के दशक में सेना ऐसे तलाशी अभियान चलाती थी, जिसके चलते रिहाइशी इलाकों में आतंकवादियों के पनाह लेने की दर में कमी देखी गई। पिछले सात महीनों में दक्षिण कश्मीर में बैंकों की गाड़ियां और एटीएम लूटने की तेरह घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें एक करोड़ से ऊपर पैसा लूटा जा चुका है। इसी तरह पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले कर उनके हथियार लूटने की घटनाएं बढ़ी हैं। इसलिए आतंकवादियों की तलाश में यह अभियान चलाया गया। हालांकि इसमें सेना को कोई उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिली है। इसके उलट सेना को स्थानीय लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ा। उन पर पत्थर फेंके गए, तलाशी अभियान से लौट रही एक टीम पर हमला किया गया, जिसमें दो सुरक्षाकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए।

अब यह छिपी बात नहीं है कि पिछले कुछ महीनों में घाटी में स्थानीय युवाओं के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। ऐसे में सुरक्षा बलों के लिए इससे पार पाना खासा चुनौती भरा काम है। सेना प्रमुख ने कठोर हिदायत दी थी कि अगर कोई स्थानीय नागरिक आतंकवादियों के विरुद्ध अभियान में बाधा डालने का प्रयास करता है, तो उसे भी आतंकी गतिविधियों में शामिल माना जाएगा। मगर उसका कोई असर नहीं हुआ। सेना अब भी आतंकवाद को बंदूक के बल पर रोकने की कोशिश कर रही है। जबकि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि रिहाइशी इलाकों में सेना के बढ़ते दखल के चलते वहां के लोगों में लंबे समय से नाराजगी है। इसलिए कानून-व्यवस्था का काम पुलिस को सौंपने की मांग उठी थी, जिसमें तत्कालीन यूपीए सरकार चरणबद्ध तरीके से सेना को हटाने पर सहमत हो गई थी। शोपियां में इसी तरह तलाशी अभियान के तहत सेना ने दर्जनों निर्दोष लोगों को मार गिराया था। अच्छी बात है कि ताजा तलाशी अभियान में सेना ने संजीदगी से काम लिया और कोई अप्रिय घटना नहीं घटने पाई। मगर स्थानीय लोगों का भरोसा जीतने के मकसद से जिस प्रथा को बंद कर दिया गया था, उसके शुरू होने के बाद कितने दिन तक ऐसा संयम बना रहेगा, देखने की बात है।

जम्मू-कश्मीर में सेना को मिले विशेषाधिकार और उनकी आड़ में उसकी ज्यादतियों के चलते घाटी के लोगों के मन में पहले ही काफी कड़वाहटें हैं। ऐसे समय में जब बातचीत का सिलसिला शुरू करने की बात हो रही है, सेना से संयम बरतने की अपेक्षा की जाती है। पहले के अनुभवों से जाहिर है कि जब-जब स्थानीय लोगों ने आतंकियों को पनाह देनी बंद की है, घाटी में अमन की सूरत बनी है। मगर इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों का विश्वास जीता जाए। सेना उनके सहयोग से ही दहशतगर्दों के मंसूबे तोड़ने में कामयाबी हासिल कर सकती है। इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दिखाने की जरूरत है। केवल बंदूक के जरिए आतंकवादियों से तो मोर्चा लिया जा सकता है, पर उसका असर सामान्य नागरिकों पर पड़ता है, तो बेहतर नतीजों की उम्मीद धुंधला जाती है। इसलिए उनका भरोसा जीतने के भी प्रयास होते रहने चाहिए। केंद्र सरकार को इसके लिए बेशक सर्वदलीय बैठक बुला कर व्यावहारिक रास्ता तलाशना चाहिए।

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