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संपादकीयः उठते सवाल

विकास दुबे की पहुंच कई राजनीतिक दलों में थी, इसीलिए सरकार चाहे किसी की रही हो, उस पर कभी किसी ने हाथ डालने का साहस नहीं दिखाया। दरअसल संकट यह है कि ऐसे आपराधिक तत्व हमारे राजनीतिक दलों की मजबूरी भी बन गए हैं।

Author Published on: July 11, 2020 1:03 AM
खुद विकास दुबे ने आशंका जताई थी कि उसे मुठभेड़ में मार दिया जा सकता है। उसने यह भी कहा था कि अगर मैंने मुंह खोल दिया तो कई पार्टियों के सफेदपोश अंदर हो जाएंगे।

कानपुर जिले के बिकरू गांव में दो जुलाई की रात आठ पुलिस कर्मियों की हत्या के मुख्य आरोपी विकास दुबे की शुक्रवार सुबह पुलिस के साथ मुठभेड़ में हुई मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं। विकास दुबे की मौत को लेकर जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं, वे ऐसे विवादों और शंकाओं को जन्म दे रही हैं जिन्हें साधारण मान कर खारिज नहीं किया जा सकता। खुद विकास दुबे ने आशंका जताई थी कि उसे मुठभेड़ में मार दिया जा सकता है। उसने यह भी कहा था कि अगर मैंने मुंह खोल दिया तो कई पार्टियों के सफेदपोश अंदर हो जाएंगे। जाहिर है, नेताओं और अधिकारियों के गठजोड़ के बारे में वह बोलता। पर अब सच्चाई का खुलासा शायद ही हो पाए। अब तक जो खबरें सामने आई हैं कि उनके मुताबिक विकास को उज्जैन से गिरफ्तार करके कानपुर लेकर आ रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्रवाई बल (एसटीएफ) का वाहन अचानक पलट गया। इस मौके का फायदा उठाते हुए विकास ने एक पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन ली और भागने की कोशिश की। जब टीम के सदस्यों ने उसे पकड़ना चाहा तो उसने फायरिंग कर दी। इस पर पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की और विकास मारा गया। आखिरकार हुआ क्या, यह तो गहन जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन यह संपूर्ण घटनाक्रम यह सोचने पर तो विवश करता ही है कि जिस एसटीएफ पर दुर्दांत अपराधी को सुरक्षित लेकर पहुंचने की जिम्मेदारी थी, आखिर वह कैसे अपने अभियान में चूक गया।

विकास दुबे की मौत और आठ पुलिस वालों की हत्या की घटना ने एक बार फिर से राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण की बहस खड़ी कर दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विकास दुबे जैसे अपराधी को खड़ा करने में पुलिस तंत्र और राजनीतिकों की भूमिका बराबर की रही। वरना विकास दुबे कैसे इतना ताकतवर अपराधी बन जाता! पिछले बीस साल के उसके आपराधिक इतिहास पर गौर करें तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि पुलिस और नेताओं की मदद से ही उसका साम्राज्य फैलता गया। विवादित जमीनों को खरीदना, अवैध कब्जे, हत्या जैसे सत्तर से ज्यादा मामले दर्ज होने के बावजूद उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। जिस अपराधी ने भरे थाने में तीस पुलिस वालों की मौजूदगी में राज्यमंत्री स्तर के नेता संतोष शुक्ला की हत्या कर दी हो और मौके पर मौजूद किसी पुलिस वाले ने उसके खिलाफ मुंह तक नहीं खोला हो, तो इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है, पुलिस के सिपाही से लेकर बड़े अफसरों तक की उससे साठगांठ थी। कानून के शासन पर इससे बड़ा तमाचा और क्या हो सकता है!

विकास दुबे की पहुंच कई राजनीतिक दलों में थी, इसीलिए सरकार चाहे किसी की रही हो, उस पर कभी किसी ने हाथ डालने का साहस नहीं दिखाया। दरअसल संकट यह है कि ऐसे आपराधिक तत्व हमारे राजनीतिक दलों की मजबूरी भी बन गए हैं। इन लोगों के सहारे ही चुनाव में वोट हासिल करने की जो कवायद होती है, उसी से राजनीति में अपराधियों का दबदबा बनता चला जाता है और फिर वे चुनावी राजनीति का लाभ उठाते हैं। मुठभेड़ में विकास की मौत को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे ज्यादा गंभीर इसलिए भी हैं कि अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस पर ही सबसे पहले अंगुली उठती है। इसलिए इस मामले की गहराई से जांच होनी जरूरी है, ताकि पुलिस और सरकार के प्रति लोगों का विश्वास डिगे नहीं और कानून के शासन में भरोसा बना रहे।

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