मणिपुर में राष्ट्रपति शासन के बाद सरकार के फिर से कमान संभालने पर यह माना जा रहा था कि राज्य में स्थायी तौर पर शांति बहाली की दिशा में प्रयास तेज होंगे। मगर इन अपेक्षाओं के विपरीत हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। जातीय संघर्ष से उपजी विरोध की चिंगारी आए दिन हिंसक घटनाओं के रूप में सामने आ रही है। स्थिति यह है कि राज्य में तैनात सुरक्षाबलों को भी अब अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। इसी कारण सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और आवाजाही के लिए रणनीतिक तौर पर बदलाव किए जा रहे हैं।

सेनापति जिले में हाल ही में असम राइफल्स के एक शिविर पर भीड़ के हमले के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने अपनी सुरक्षा के लिए करीब सौ बुलेटप्रूफ वाहनों को अपने काफिले में शामिल किया है। ऐसे में सवाल है कि जब सुरक्षाबलों की सुरक्षा को ही खतरा पैदा हो गया है, तो आम लोग खुद को कैसे सुरक्षित महसूस कर पाएंगे? आखिर क्या वजह है कि राज्य में सामाजिक सौहार्द और अमन-चैन कायम करने के प्रयासों में सरकार की इच्छाशक्ति एवं गंभीरता नजर नहीं आ रही है?

गौरतलब है कि मणिपुर में हाल के दिनों में हिंसक घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। पिछले सप्ताह उखरुल जिले में उग्रवादियों के घात लगाकर किए गए हमले में असम राइफल्स के दो जवान शहीद हो गए थे। इसके कुछ दिन बाद सेनापति जिले में स्थानीय लोगों की भीड़ ने सैन्य बल के शिविर पर हमला कर वहां आगजनी और तोड़फोड़ की।

ये घटनाएं बताती हैं कि राज्य में आम लोगों के असंतोष के बीच उग्रवादी संगठनों की सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। हालांकि, कुछ विरोधी संगठनों ने सरकार के साथ समझौता कर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इनसे इतर नए समूह खड़े हो गए हैं, जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हिंसक वारदात को अंजाम देने का कोई मौका नहीं चूकते। राज्य में जटिल होते हालात के पीछे एक कारण यह भी है कि स्थानीय लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो रहा है। ऐसे में सबसे पहले सरकार की प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि आम लोगों में विश्वास बहाली के लिए गंभीरता से प्रभावी कदम उठाए जाएं।