मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय तनाव के बीच हिंसा फिर से अपने पांव पसारने लगी है। राज्य में शांति बहाली को लेकर सरकार के तमाम दावों के बावजूद उग्रवादी संगठनों की बढ़ती सक्रियता आग में घी का काम कर रही है।
उखरुल जिले में सोमवार को उग्रवादियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में असम राइफल्स के दो जवानों के शहीद हो जाने की घटना ने समूची सुरक्षा व्यवस्था पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर सुरक्षाबलों के जवान ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम लोग अपनी सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा करेंगे।
सवाल है कि केंद्र और राज्य सरकारों का विद्रोही गुटों के साथ शांति समझौते के बाद भी अगर उग्रवादी संगठन हिंसक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं, तो इसकी वजह पता लगाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या सिर्फ सुरक्षाबलों की अतिरिक्त तैनाती के दम पर राज्य में शांति बहाल हो पाएगी? जाहिर है कि इसके लिए समस्या की जड़ में जाकर समाधान के रास्ते तलाशने होंगे।
गौरतलब है कि मणिपुर में वर्ष 2023 में मेइती और कुकी-जो समूहों के बीच शुरू हुए जातीय संघर्ष में ढाई सौ से अधिक लोगों की जान गई है और हजारों लोग बेघर हुए हैं। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बावजूद हालात में ठोस सुधार संभव नहीं हो सका।
वहां सरकार के फिर से कमान संभालने के बाद हिंसक गतिविधियां नए सिरे से जोर पकड़ने लगी हैं। राज्य में आए दिन सामुदायिक झड़पों, उग्रवादियों के हमले और विरोध-प्रदर्शन की खबरें आती रहती हैं।
बीते रविवार शाम को भी कांगपोकपी जिले के थिंगखोंगजांग में एक गांव पर हथियारबंद समूह ने हमला कर दिया था, जिसमें कई लोग घायल हो गए थे। इस तरह की घटनाएं निश्चित रूप से राज्य में सामुदायिक सौहार्द को बिगाड़ने का काम कर रही हैं, लेकिन सवाल है कि सरकार की नीतियां सुरक्षा एवं शांति बहाली के मोर्चे पर कमजोर साबित क्यों हो रही हैं।
किसी हिंसक वारदात के बाद पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने और जातीय मतभेदों का स्थायी हल निकालने के लिए सरकार की ओर से गंभीरता क्यों नजर नहीं आ रही है? निस्संदेह, जब तक स्थानीय लोगों को भरोसे में नहीं लिया जाएगा, तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं है।
