मणिपुर में सरकार के तमाम दावों के बावजूद हिंसा की घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। सामुदायिक संघर्ष, उग्रवादी संगठनों की बढ़ती सक्रियता और सुरक्षाबलों की उदासीनता से राज्य में कानून-व्यवस्था फिर से पटरी से उतरती प्रतीत हो रही है। ऐसे में शांति कायम करने की दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति, गंभीरता और संवेदनशीलता का अभाव भी साफ नजर आता है।
यही वजह है कि राज्य में उग्रवादियों के लक्षित हमले, आमजन को बंधक बनाने, निर्दोष लोगों की हत्या करने, आगजनी और इन वारदातों के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं। शुक्रवार को भी कांगपोकपी जिले में एक गांव पर सशस्त्र हमलावरों ने धावा बोल दिया और गोलीबारी में एक महिला समेत तीन लोगों की मौत हो गई। सवाल है कि आखिर हिंसा की यह चिंगारी अंदर ही अंदर क्यों सुलगती जा रही है? दरअसल, यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की ही समस्या नहीं है, बल्कि आम लोगों में पनप रहा अविश्वास और असुरक्षा की भावना भी इसकी बड़ी वजह है।
स्थायी समाधान की तलाश अब भी अधूरी
गौरतलब है कि मणिपुर बीते तीन साल से भी अधिक समय से जातीय हिंसा का दंश झेल रहा है, जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। इस बीच राज्य और केंद्र सरकारों की ओर से हालात पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए गए, लेकिन अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आए।
हालांकि, पिछले कुछ समय में राज्य में हिंसक घटनाओं में कमी देखी गई, लेकिन इन पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया है। राज्य सरकार का दावा है कि हिंसक वारदातों को अंजाम देने वालों के खिलाफ सख्ती से निपटा जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोषियों पर तत्काल कार्रवाई की मांग को लेकर लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते नजर आते हैं।
यह बात सच है कि केवल सामाजिक मतभेद इतने लंबे समय तक हिंसा को जीवित नहीं रख सकते। असली समस्या तब पैदा होती है जब लोगों का सरकार और प्रशासन पर भरोसा टूटने लगता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि राज्य में उग्रवादी समूहों पर कड़ी नजर रखी जाए, हिंसक घटनाओं में तत्काल कार्रवाई की जाए और आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए सरकार स्थायी समाधान तलाशने का प्रयास करे।
