मणिपुर तीन साल से हिंसा की आग में झुलस रहा है। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। करीब ढाई सौ से ज्यादा लोग हिंसा में जान गंवा चुके हैं। हजारों लोगों के विस्थापन से राज्य का सामाजिक ताना-बाना टूट-सा गया है। राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद आखिर क्या वजह है कि उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लग सका है।

बीते बुधवार को उग्रवादियों ने एक बार फिर हमला कर तीन लोगों की हत्या कर दी। कांगपोकपी जिले में अंधाधुंध गोलीबारी में चार नागरिक भी घायल हो गए। इस घटना से नाराज नागरिकों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-2 को बंद कर दिया। गौरतलब है कि यह मार्ग मणिपुर को न केवल नगालैंड से, बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी जोड़ता है। इस समय राज्य में कानून-व्यवस्था की जो स्थिति बनी हुई है, वह बेहद चिंताजनक है। एक बार फिर हुई हिंसा से साबित होता है कि सुरक्षा एजेंसियां सशस्त्र समूहों को नियंत्रित कर पाने में विफल रही हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप का भी कोई असर नहीं दिखता। समझौते भी औपचारिक बनकर रह गए हैं।

दरअसल, मणिपुर में शांति बहाली का कोई भी प्रयास इसलिए भी नाकाम हो जाता है, क्योंकि परस्पर विरोधी समूहों को कायदे से अब तक संवाद की मेज पर नहीं लाया जा सका है और न ही शायद इसकी जरूरत महसूस की गई। यही वजह है कि अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे सशस्त्र समूहों में एक-दूसरे के प्रति संदेह और अविश्वास खत्म नहीं हो रहा।

यह निराशाजनक ही है कि जब भी राज्य में थोड़ी-बहुत स्थिति सुधरती दिखाई देती है, कोई न कोई उग्रवादी हमला राज्य को हिंसा की आग में झोंक देता है। सरकार अगर अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों को संवाद के लिए राजी करती, तो शायद उनके बीच भरोसा कायम होता। मगर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों के भीतर इस मसले पर कोई संजीदगी नहीं दिखती।

आज राज्य में शांति प्रबंधन की नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने के लिए सक्रिय होने की जरूरत है। इसके लिए राज्य सरकार और केंद्रीय सुरक्षा बलों को मिलकर काम करना होगा, अन्यथा मणिपुर में लगातार जारी हिंसा के घातक नतीजे सामने आ सकते हैं।