मणिपुर में कुछ दिनों तक हालात थोड़े सामान्य रहने के बाद हिंसा की घटनाएं फिर से अपने पांव पसारने लगी हैं। सरकार का दावा है कि इसके पीछे असामाजिक तत्त्वों की भूमिका ज्यादा है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि राज्य के लोगों में असंतोष की वजह से विरोध प्रदर्शनों का दौर लौटने लगा है, जो सौहार्दपूर्ण वातावरण के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक है। इंफाल पश्चिम जिले में बीते शुक्रवार को हजारों लोगों ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए मशाल रैली निकाली और इस दौरान सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी हिंसक झड़पें भी हुईं।
स्थानीय लोग हाल में एक घर पर बम से हुए हमले में दो बच्चों की मौत की घटना का विरोध कर रहे थे। सवाल है कि क्या सुरक्षा एजेंसियां राज्य में स्थिति की संवेदनशीलता को जानते हुए भी अपना काम ठीक से नहीं कर रही हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो फिर आम लोगों में शासन-प्रशासन के खिलाफ आक्रोश क्यों पैदा हो रहा है!
गौरतलब है कि मणिपुर के बिष्णुपुर जिले में सात अप्रैल को एक घर पर बम से हमला किया गया था, जिसमें दो मासूम बच्चों की जान चली गई थी। इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों के प्रदर्शन के दौरान हिंसक झड़पों में तीन लोगों की मौत हो गई थी। लोग इन बच्चों की हत्या के दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी जांच-पड़ताल की प्रक्रिया को तेज करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करें।
यह विचित्र है कि जब सरकार खुद इस बात को स्वीकार कर रही है कि राज्य के कई हिस्सों में हालात अब भी संवेदनशील बने हुए हैं, तो फिर सुरक्षा एजेंसियों की ओर से किसी भी अप्रिय घटना के बाद संवेदनशीलता क्यों नजर नहीं आती! राज्य में हिंसा की बढ़ती घटनाओं से स्पष्ट है कि हालात राख के नीचे छिपी चिंगारी जैसे हैं, जो मौका मिलते ही आग का रूप ले लेती है। इसलिए सरकार और सुरक्षाबलों को ईमानदार, खुले एवं निष्पक्ष जन संवाद को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि कानून पर लोगों का भरोसा कायम रहे।
