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स्त्री की सुध

ई नीति के मसविदे में स्त्रियों के हर पक्ष को ध्यान में रखा गया है। उसे रहने लायक वातावरण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि सभी पहलू इसमें शामिल होंगे। यों हर सरकार महिलाओं की उन्नति के लिए योजनाएं बनाती, सुविधाएं उपलब्ध कराती है, पर वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पातीं।

Author July 1, 2019 2:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाएं हैं। कई कड़े कानून हैं। अनेक क्षेत्रों में उन्हें विशेष सुविधाएं भी दी गई हैं। हर कहीं स्त्री सशक्तिकरण पर जोर दिया जाता रहा है। मगर हकीकत यह है कि आज तक महिलाओं को समाज में समुचित सम्मान नहीं मिल पाया है। न तो परिवारों में उनके भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, निजी चुनाव आदि को अहमियत दी जाती है और न समाज में उनके महत्त्व को समझा जाता है। उनकी सुरक्षा के तमाम प्रयासों के बावजूद घर के भीतर और बाहर उन पर हिंसा के मामले बढ़े ही हैं। हालांकि महिलाओं ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपने हुनर और कौशल से साबित कर दिया है कि वे पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं, पर उनके योगदान को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाता। ऐसे में स्त्री सशक्तिकरण के मद्देनजर राष्ट्रीय नीति बनाने की पहल समय की मांग है। केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस नीति का मसविदा तैयार किया है। इस नीति के बनने से स्वाभाविक ही स्त्रियों की दशा में कुछ सुधार की उम्मीद जगी है।

नई नीति के मसविदे में स्त्रियों के हर पक्ष को ध्यान में रखा गया है। उसे रहने लायक वातावरण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि सभी पहलू इसमें शामिल होंगे। यों हर सरकार महिलाओं की उन्नति के लिए योजनाएं बनाती, सुविधाएं उपलब्ध कराती है, पर वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पातीं। जो महिलाएं पढ़-लिख कर स्वावलंबी बन चुकी हैं, अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सराहनीय योगदान कर रही हैं, वे भी घर और बाहर सुरक्षित तथा सम्मानित महसूस नहीं कर पाती हैं। ऐसे में दूर-दराज के इलाकों, ग्रामीण क्षेत्रों में घर की चारदीवारी के भीतर रहने वाली, मजूरी वगैरह करके परिवार का पेट पालने वाली महिलाओं के बारे में समाज कितना संवेदनशील होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यों महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव, उनके अपमान, उनकी इच्छाओं का सम्मान न करने, उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है, पर वास्तव में उन्हें अपेक्षित न्याय नहीं मिल पाता। इसलिए प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति में उन पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा।

महिलाओं को उनका हक न मिल पाने के पीछे बड़ा कारण समाज की मानसिकता है। समाज उन्हें कमतर मानता आया है। उनके भोजन, पोषण, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। उन्हें घर में सीख दी जाती है कि वे लड़कों से कमतर हैं, उन्हें घर की चारदीवारी के भीतर ही रहना है। समाज में शिक्षा का स्तर तो बढ़ रहा है, पर इसी मानसिकता की वजह से स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म की घटनाएं रुक नहीं रहीं। कानून हैं, कड़े दंड के प्रावधान हैं, पर ऐसी घटनाएं रुक नहीं रहीं, तो उसके पीछे इन कानूनों का पालन कराने वाले पुरुष अमले की मानसिकता जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदले बिना स्त्री के वास्तविक सशक्तिकरण का सपना धुंधला ही रहेगा। इसलिए कानून के साथ-साथ उन पर अमल कराने वालों की जवाबदेही भी तय होनी जरूरी है।

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