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संपादकीयः गुणवत्ता का पाठ

केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए ताजा विस्तार में सबसे ज्यादा ध्यान मानव संसाधन विकास मंत्रालय में हुए फेरबदल ने खींचा, जिसमें यह जिम्मेदारी स्मृति ईरानी से लेकर प्रकाश जावडेकर को सौंपी गई।

Author July 9, 2016 02:04 am
प्रकाश जावडेकर

केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए ताजा विस्तार में सबसे ज्यादा ध्यान मानव संसाधन विकास मंत्रालय में हुए फेरबदल ने खींचा, जिसमें यह जिम्मेदारी स्मृति ईरानी से लेकर प्रकाश जावडेकर को सौंपी गई। अब जावडेकर ने पदभार ग्रहण करने के बाद शैक्षिक गुणवत्ता को सबसे बड़ी चुनौती बताया है। लिहाजा, उनसे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सालों से उपेक्षित पड़े या टालमटोल के शिकार इस पहलू पर कुछ सार्थक शुरुआत हो। गुरुवार को उन्होंने कहा कि देश में शिक्षा के क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौती उसकी गुणवत्ता बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षा सभी तक पहुंचे। उन्होंने शिक्षक-पदों की रिक्तियां भरने समेत कई अहम मुद्दों पर अपनी राय जाहिर की। देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पड़े लाखों पदों को भरना एक प्राथमिक जिम्मेदारी है।

लेकिन कई राज्यों में शिक्षक प्रशिक्षण की जो दशा और स्तर है या शिक्षकों की भर्तियों में खर्च बचाने के लिए जिस तरह अनुबंध प्रणाली का सहारा लिया जा रहा है, उससे किसी बेहतर भविष्य का संकेत सामने नहीं आता। कुछ राज्यों में तो जरूरत की दलील पर बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया। जबकि लंबे समय से सर्वशिक्षा अभियान और शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बावजूद सच यह है कि आज भी देश के स्कूलों में शिक्षकों के लाखों पद खाली हैं। इसके अलावा, जो शिक्षक फिलहाल स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, उनके प्रशिक्षण और ज्ञान का स्तर भी एक बड़ी समस्या है। करीब पांच साल पहले केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से आयोजित केंद्रीय शिक्षक दक्षता जांच में शामिल हुए शिक्षकों में से निन्यानवे फीसद फेल हो गए थे। तब इसे शिक्षा की गुणवत्ता के लिहाज से सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू माना गया था।

लेकिन इस समस्या के संदर्भ में नए मंत्री ने एक बेहद जरूरी पहलू की ओर ध्यान दिलाया है। उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा के क्षेत्र में नवोन्मेष की कमी इसलिए है कि यहां स्कूलों में विद्यार्थियों को सवाल पूछने से हतोत्साहित किया जाता है। यह भारतीय स्कूलों और शिक्षकों की एक ऐसी तल्ख हकीकत है जिसका शुरुआती उम्र के विद्यार्थियों के मानस और उनके सीखने-समझने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ता है। जाहिर है, यह जितना शिक्षकों के अज्ञान से जुड़ा है, उससे ज्यादा उनके सामाजिक व्यवहार से संचालित होता है। इसलिए समूचे शिक्षक प्रशिक्षण में इस पहलू को भी केंद्र में रखने की जरूरत होगी।

जिस दौर में दुनिया के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में भारत को संतोषजनक स्थान नहीं मिल सकने की खबरें जब-तब आ रही हों या देश के भीतर होने वाले सर्वेक्षणों में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता का दयनीय स्तर सामने आ रहा हो, उसमें मानव संसाधन विकास मंत्री की चिंता एक शुभ संकेत है। सवाल है कि शिक्षा को लेकर सरकारों का जो खानापूर्ति का रवैया रहा है, उसके रहते मौजूदा तस्वीर को बदलने की रूपरेखा क्या होगी। खुद भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने के बाद शिक्षा-बजट में जिस पैमाने की कटौती की गई, उसका संदेश क्या है! इस रुख का हासिल यही होना है कि समूची शिक्षा व्यवस्था में सरकार की भूमिका कम होने के साथ निजी क्षेत्रों का दखल बढ़ेगा। इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि निजी क्षेत्र में धन-आधारित शिक्षा व्यवस्था तक किस तबके की पहुंच होगी।

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