पिछले करीब दो महीने से पश्चिम एशिया में संघर्ष के बीच वैश्विक स्तर पर जिस तरह की परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसमें रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की आपूर्ति बाधित होने के साथ ही महंगाई की रफ्तार भी तेज हुई है। ऐसे में भारत में भी महंगाई के बेलगाम होने की आशंका पहले से जताई जा रही थी। मगर ऐसा लगता है कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ही सरकार ने जरूरी चीजों की कीमतों की लगाम को थाम के रखा हुआ था। गौरतलब है कि शुक्रवार को खाना पकाने के वाणिज्यिक गैस सिलेंडर की कीमत में नौ सौ तिरानबे रुपए की भारी बढ़ोतरी कर दी गई।

वहीं चूंकि सामान्य घरेलू गैस सिलेंडर की आपूर्ति बाधित है, इसलिए पांच किलो गैस वाले छोटे सिलेंडर उपलब्ध तो कराए जा रहे हैं, लेकिन उसकी कीमत में भी दो सौ इकसठ रुपए की बढ़ोतरी कर दी गई और अब इसके लिए उपभोक्ताओं को आठ सौ दस रुपए पचास पैसे देने होंगे। इसके अलावा, विमान ईंधन और थोक डीजल के मूल्य में भी वृद्धि की गई है।

कहने को ताजा बढ़ोतरी का असर आबादी के एक छोटे हिस्से पर पड़ने की बात कही जा रही है, लेकिन इतना तय है कि इसका दायरा बड़ा होने वाला है। मसलन, केवल वाणिज्यिक गैस सिलेंडर को ही देखें, तो इसकी कीमत अब तीन हजार रुपए से भी ज्यादा हो गई है। जाहिर है, होटल, ढाबे या खाना पकाने का व्यवसाय करने वाले लोग अगर इसका उपयोग करेंगे, तो सीधे-सीधे इसका असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों और लोगों की थाली पर पड़ेगा। संभव है कि कम आय वाले लोगों के व्यवसाय पर भी इसका विपरीत असर पड़े।

फिर इस बात की क्या गारंटी है कि जिन कारणों से वाणिज्यिक गैस सिलेंडर के दाम में इजाफा करने को उचित ठहराया जा रहा है, उसी तरह के दूसरे कारण से आने वाले दिनों में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत नहीं बढ़ाई जाएगी। आखिर छोटे सिलेंडर की कीमत में खासी बढ़ोतरी कर ही दी गई है, जिसका उपयोग आमतौर पर प्रवासी मजदूर से लेकर आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोग करते हैं। इसी तरह, अब यह कहना मुश्किल है कि विमान ईंधन और थोक डीजल के मूल्यों में वृद्धि केवल यहीं तक रुक जाएगी। अभी से आम उपयोग वाले पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जाने लगी है।

जाहिर है, एक ऐसा दौर शुरू हो चुका है, जिसमें महंगाई का दुश्चक्र आने वाले दिनों में और ज्यादा जटिल होता दिख रहा है। खासतौर पर डीजल की कीमतों में इजाफे के बाद ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और इसके बाद चौतरफा महंगाई की मार सबके लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। वैश्विक स्तर पर पसरी अस्थिरता की वजह से अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हाल के दिनों में जो सुस्ती देखी जा रही है, बाजार भी तेज उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, उसमें एक बड़ी आबादी रोजी-रोजगार के सवालों से जूझ रही है।

लगातार घटती क्रयशक्ति के दौर में महंगाई की मार का असर कितना गहरा हो सकता है, इसका बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। सवाल है कि अगर पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से उपजे संकट के बावजूद सरकार ने करीब दो महीने तक तेल और गैस की कीमतों को कमोबेश थाम कर रखा था और इनकी उपलब्धता के वैकल्पिक रास्ते निकाल रही थी, तो अचानक ही उसे महंगाई को इस तरह खुला छोड़ देने की जरूरत क्यों पड़ी! क्या कुछ दिनों की राहत का कारण पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव थे?