ताज़ा खबर
 

संपादकीय: जांच पर रार

यह पहला मौका नहीं है, जब किसी राज्य सरकार ने सीबीआइ जांच संबंधी अपनी आम सहमति को वापस ले लिया है। इससे पहले, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान भी आम सहमति वापस ले चुके हैं।

sushant Singh Rajput, TRP fraud case, Republic TRP, CBI, Indian Express, Republic TV, jansattaTRP Scam: महाराष्ट्र सरकार नहीं चाहती कि टीआरपी मामले की जांच सीबीआई करे। (file)

अब महाराष्ट्र सरकार ने सीबीआइ जांच संबंधी अपनी आम सहमति को वापस ले लिया है। बिना राज्य सरकार की सहमति के सीबीआइ अब महाराष्ट्र के किसी मामले की जांच नहीं कर सकती। इससे केंद्र और राज्य सरकार के बीच संबंधों में खटास और बढ़ गई है।

पांच टीवी चैनलों के टीआरपी चोरी मामले की जांच सीबीआइ से कराने की बात उठी थी। तब महाराष्ट्र सरकार को लगा कि अगर यह मामला सीबीआइ के हाथ में गया, तो वह केंद्र सरकार की इच्छाओं के अनुरूप ही अपनी रिपोर्ट देगी। इन चैनलों में से एक चैनल ऐसा है, जो लगातार न सिर्फ महाराष्ट्र सरकार पर हमला बोलता रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री के खिलाफ तल्ख भाषा का इस्तेमाल करता रहा है। इससे वहां की सरकार खासी नाराज है।

विधानसभा में उस चैनल के एंकर के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव तक पारित किया गया। ऐसे में अगर सीबीआइ उसे बचाने का प्रयास करेगी, तो महाराष्ट्र सरकार की एक तरह से हार ही साबित होगी। हालांकि यह मामला तो एक बहाना है, असल तकरार केंद्र और राज्य सरकार के बीच पहले ही दिन शुरू हो गई थी जब शिवसेना ने भाजपा का साथ छोड़ कर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन बना लिया था। यों सीबीआइ का दायरा केंद्र से जुड़े महकमों में भ्रष्टाचार आदि के मामलों की जांच करने तक सीमित है।

अगर कोई राज्य सरकार अपने यहां किसी मामले की जांच उससे कराने की गुजारिश करती है, तभी केंद्र इसकी इजाजत देता है। इसके अलावा अगर अदालत किसी मामले में सीबीआइ जांच का आदेश देती है, तो उसे वह जांच करनी पड़ती है। बहुत सारे राज्यों ने केंद्र को आम सहमति दी हुई है कि वह चाहे, तो किसी भी मामले की सीबीआइ जांच का आदेश दे सकता है।

मगर देखा गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टियां राज्यों में अपने विरोधी दलों की सरकारों को परेशान करने की नीयत से भी सीबीआइ जांच का आदेश देती रही हैं। सीबीआइ के केंद्र के इशारे पर काम करने का आरोप बहुत पुराना है। यूपीए सरकार के समय में तो सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पिंजरे का तोता तक कह दिया। फिर वर्तमान सरकार के पिछले कार्यकाल में जिस तरह सीबीआइ अधिकारियों के रातोंरात तबादले का मामला उठा तब भी उसकी स्वायत्तता पर सवाल उठे थे। लिहाजा, सीबीआइ के कामकाज पर राज्य सरकारों का भरोसा डिगना कोई अचरज की बात नहीं।

यह पहला मौका नहीं है, जब किसी राज्य सरकार ने सीबीआइ जांच संबंधी अपनी आम सहमति को वापस ले लिया है। इससे पहले, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान भी आम सहमति वापस ले चुके हैं। संघीय ढांचे में अपेक्षा की जाती है कि राज्य सरकारें केंद्र के साथ तालमेल बिठा कर काम करेंगी। मगर कुछ सालों में उन राज्यों की केंद्र सरकार से लगातार तकरार देखी जा रही है, जहां गैरभाजपा शासित सरकारें हैं। उन्हें लगता रहा है कि जांच एजेंसियों की मार्फत केंद्र सरकार उनके खिलाफ कोई षड्यंत्र रच सकती है।

यों कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों का विषय है, इसलिए तमाम तरह के अपराधों की जांच वे खुद कराने का प्रयास करती हैं। मगर जब कोई मामला ज्यादा पेचीदा हो जाता है, जिसमें राज्यों की पुलिस उसे सुलझाने में विफल साबित हो सकती है, उसकी सीबीआइ से जांच कराने की मांग करती हैं।

मगर केंद्र सरकार कई मामलों में जन-दबाव का हवाला देकर राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करती देखी जाती है। इससे केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास कमजोर हुआ है। महाराष्ट्र सरकार के ताजा फैसले के पीछे भी यही वजह है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीयः रैली में रेला
2 संपादकीयः दमन का सहारा
3 संपादकीयः दुश्चक्र से दूर
ये पढ़ा क्या?
X