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सावधानी का वक्त

दूसरी लहर का असर कम पड़ने के साथ ही राज्यों ने डेढ़ महीने से ज्यादा की बंदी-पाबंदियों में ढील देना शुरू कर दिया है।

केरल के कन्नूर में एक शव के दाह संस्कार करने की तैयारी करते वॉलिंटियर्स (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

दूसरी लहर का असर कम पड़ने के साथ ही राज्यों ने डेढ़ महीने से ज्यादा की बंदी-पाबंदियों में ढील देना शुरू कर दिया है। यह अब अपरिहार्य हो गया है। क्योंकि लंबे समय से कारोबारी गतिविधियां बंद पड़ी हैं। अर्थव्यवस्था को भारी चपत लग रही है। आम लोगों को मुश्किलों से दो-चार होना पड़ रहा है। ऐसे पाबंदियों को चरणबद्ध तरीके से हटाने के अलावा कोई रास्ता बचता भी नहीं है। इसीलिए दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्य अपने-अपने हिसाब से प्रतिबंधों में ढील दे रहे हैं।

महाराष्ट्र ने ढील देने की पांच स्तरीय योजना लागू की है। ढील देने का पैमाना साप्ताहिक संक्रमण दर और अस्पतालों में आॅक्सीजन बिस्तरों की उपलब्धता को बनाया है। जहां खतरा सबसे कम होगा, वहां सभी बाजार, मॉल, रेस्तरां, सिनेमाघर, खेल प्रतिष्ठान, जिम, सभी सरकारी और निजी दफ्तरों को महामारी से पूर्व की तरह खोला जाएगा। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी तीन घंटे के लिए बार, रेस्तरां आदि खोलने की छूट दी है। तमिलनाडु सरकार ने सुबह छह बजे से शाम पांच बजे तक सारे बाजार खोलने और दफ्तर खोलने का फैसला किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी ज्यादातर जिलों में बाजार खोलने का समय बढ़ाया है। दिल्ली सरकार निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां शुरू करने की अनुमति तो पिछले हफ्ते ही दे चुकी थी।

सच तो यह है कि महामारी का खतरा कहीं से कम नहीं पड़ा है। अभी सिर्फ असर कम हुआ है। राहत की बात इतनी ही है कि संक्रमण की दर कम हुई है। मरीजों के स्वस्थ्य होने की दर भी पनचानवे फीसद से ऊपर है। मौतों के आंकड़े भी नीचे आ रहे हैं। ऐसे में सावधानी के साथ काम-धंधे फिर से शुरू करने में कोई हर्ज नहीं। इससे तो हालात सामान्य बनाने में मदद ही मिलेगी। बंदी और पाबंदियों से सबसे ज्यादा मुश्किल रोजाना कमाने-खाने वाले तबके को हो रही है। इनमें दिहाड़ी मजदूरों से लेकर रेहड़ी-पटरी लगाने वाले तक हैं। छोटे-मोटे कारोबारी हैं। बंदी की सबसे ज्यादा मार इसी तबके पर पड़ी है। एक करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए। एक मोटा अनुमान यह है कि इस बार डेढ़ महीने की बंदी से देश को पंद्रह लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

मौजूदा हालात में फूंक-फूंक कर ही कदम उठाने की जरूरत है। एक साथ सारी गतिविधियों को खोल देने फिर से बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है। इसलिए हर जगह के हालात को देखते हुए ही ढील देना उचित होगा। गौरतलब है कि इस बार दिल्ली सरकार ने पचास फीसद क्षमता के साथ मेट्रो चलाने की छूट दी है। मॉल और बाजार सम-विषम आधार पर खुलेंगे, ताकि बाजारों में भीड़ न बढ़े। राज्यों के सामने अब दोहरी चुनौती है। कारोबार गतिविधियां शुरू करते हुए जनजीवन को पटरी पर लाना है और संक्रमण को भी फैलने से रोकना है।

छोटे-बड़े कारोबार ही राज्यों के राजस्व का स्रोत होते हैं। इसी से अर्थव्यवस्था चलती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हालात सामान्य बनाने में नागरिकों की भूमिका सबसे अहम है। ढील का मतलब यह कतई नहीं कि अब सब कुछ सामान्य हो चला है। जरा-सी छूट मिलते ही लोग किस कदर बेपरवाह हो जाते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तीसरी लहर का खतरा सामने है। ऐसे में महामारी से बचाव के लिए जरूरी नियमों का सख्ती से पालन ही हमें संकट से बचाएगा। वरना फिर से घरों में कैद होने की नौबत आ सकती है।

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