Madhya Pradesh farmers' protest: Rahul Gandhi Don't miss the political opportunity to make his presence visible - Jansatta
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संपादकीयः आंदोलन की आंच

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मंदसौर दौरे के साथ ही किसान आंदोलन को लेकर सियासी तापमान चढ़ गया।

Author June 10, 2017 2:45 AM
गुरुवार को मृतक किसानों के परिजनों से मिलने मंदसौर पहुंचने वाले थे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी। पुलिस ने नीमच में राहुल को रोका। (Photo Source: INC India/Twitter)

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मंदसौर दौरे के साथ ही किसान आंदोलन को लेकर सियासी तापमान चढ़ गया। भाजपा की निगाह में राहुल का दौरा किसानों के मुद्दे का राजनीतिकरण करने का प्रयास है। केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने इसे फोटो अवसर यात्रा कह कर राहुल के दौरे का मजाक उड़ाने की भी कोशिश की। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में एक और किसान के आत्महत्या कर लेने की खबर आई। भाजपा को घेरने का विपक्ष को यह एक अच्छा मौका दिख रहा है, तो उसे वह क्यों गंवाना चाहेगा! विपक्ष पर बिफरने के बजाय भाजपा को सोचना चाहिए कि यह नौबत क्यों आई, और मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र के किसान क्यों आंदोलित हैं। दूसरे राज्यों में भी किसान आंदोलन शुरू होने का डर भाजपा को क्यों सता रहा है? यह सही है कि कई जगह किसान आंदोलन ने हिंसक रुख अख्तियार कर लिया। पर उनसे बातचीत की पहल क्यों नहीं की गई? मध्यप्रदेश सरकार तो लगता है मानो इसे बस कानून-व्यवस्था का प्रश्न मान कर चल रही थी। किसानों का आक्रोश बढ़ने के डर से यह भ्रम फैलाया गया कि जो पांच किसान फायरिंग में मारे गए उसके पीछे कथित अराजक तत्त्वों का हाथ था। पर अब राज्य की तरफ से केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट से साफ है कि ये किसान पुलिस की गोली से मारे गए।

मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे और राहत के कुछ अन्य कदमों की घोषणा करके राज्य सरकार किसानों का गुस्सा शांत करना चाहती है। पर आंदोलन की मूल मांग से मध्यप्रदेश सरकार भी किनारा कर रही है और महाराष्ट्र सरकार भी। महाराष्ट्र में आंदोलन प्याज, टमाटर, तुअर की वाजिब कीमत दिलाने की मांग से शुरू हुआ। अलबत्ता कर्जमाफी की मांग भी इसमें जुड़ गई। मंदसौर, नीमच, इंदौर समेत पश्चिमी मध्यप्रदेश में भी आंदोलन का कारण उपज का न्यायसंगत मूल्य न मिल पाना रहा है। इससे पहले तमिलनाडु के किसानों के दिल्ली धरने ने देश भर का ध्यान खींचा था। वह धरना सूखा-पीड़ित किसानों का था। पर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसानों का आंदोलन फौरी राहत की चाहत से नहीं निकला है, दोनों राज्यों के किसानों ने एकदम बुनियादी मांग उठाई है- उन्हें उनकी उपज का वाजिब मूल्य मिले। वाजिब दाम मिलना तो दूर, अभी उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। विडंबना यह है कि किसानों को आंदोलन के लिए मजबूर ही न होना पड़ता, अगर भाजपा ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया होता। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी उपज का डेढ़ गुना दाम मिले। इस वायदे को पूरा करना तो दूर, इस दिशा में कुछ कदम भी चलना मोदी सरकार को गवारा नहीं हुआ।

शिवराज सिंह सरकार यह दावा करते नहीं थकती कि मध्यप्रदेश देश में सबसे ज्यादा कृषि वृद्धि दर वाला राज्य है। इस दावे की हकीकत जो हो, सवाल है कि इस वृद्धि दर का किसानों को क्या लाभ मिला है? पिछले दिनों केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़े आए तो पता चला कि औद्योगिक वृद्धि दर भले गिरी हो, कृषि क्षेत्र ने शानदार प्रदर्शन किया है। लेकिन किसानों की खुदकुशी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। खेती जब सूखे या ओलावृष्टि के चलते मारी जाती है, तब तो किसान मुसीबत में होता है, क्योंकि उसके पास बेचने को कुछ नहीं होता, मगर जब बंपर पैदावार होती है तब भी किसान खुद को ठगा हुआ पाता है, क्योंकि उसे उपज का मूल्य नहीं मिल पाता है। कई बार लागत भी नहीं निकल पाती है। जाहिर है, किसानों की असली समस्या यह है कि खेती घाटे का धंधा बन चुकी है। बेशक यह स्थिति यूपीए सरकार के समय भी थी। लेकिन किसानों से भाजपा के वायदे का क्या हुआ!

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