ताज़ा खबर
 

संपादकीयः विस्तार की बुनियाद

राजनीति और सत्ता के गणित में ऐसी उखाड़-पछाड़ चलती रहती है। मगर अब मंत्रिमंडल का गठन हो गया है और शिवराज सिंह सरकार से कामकाज की अपेक्षाएं हैं। इस कोरोना संकट के दौर में, जब मध्यप्रदेश खतरनाक स्थितियों से जूझ रहा है, बिना मंत्रियों के सरकार के लिए काम करना कठिन था।

Author Published on: July 3, 2020 12:47 AM
Shivraj Singh Chauhan cabinet expansion,कमलनाथ सरकार गिरने के बाद जब शिवराज सिंह चौहान ने राज्य की कमान संभाली, तब देश में पूर्णबंदी लागू थी।

मध्यप्रदेश में आखिरकार शिवराज सिंह चौहान सरकार में मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। अट्ठाईस मंत्रियों ने शपथ ले ली। करीब सौ दिन तक सरकार केवल पांच मंत्रियों के साथ काम करती रही। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद जब शिवराज सिंह चौहान ने राज्य की कमान संभाली, तब देश में पूर्णबंदी लागू थी। लोगों का अपने घरों से बाहर निकलना वर्जित था। इसलिए उस वक्त सिर्फ पांच मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकी थी। मगर उसके बाद मंत्रिमंडल विस्तार में इतनी देर लगी, तो उसकी वजहें कुछ और थीं। एक तो राज्यपाल के अस्वस्थ होने का कारण बताया गया। पर हकीकत यह है कि द्वंद्व इस बात को लेकर था कि मंत्रिमंडल में किन लोगों को शामिल किया जाए। दरअसल, शिवराज सिंह चौहान सरकार कांग्रेसी विधायकों के बगावत और इस्तीफे के बाद बनी थी। उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे कांग्रेस में महत्त्व न मिलने से नाखुश थे। जाहिर है, शिवराज सिंह सरकार में उन्हें अधिक महत्त्व मिलने की अपेक्षा थी। इसलिए शुरू से स्पष्ट था कि मध्यप्रदेश सरकार में सिंधिया समर्थकों को अधिक जगह मिलेगी। वही हुआ। मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया समर्थकों को तरजीह दी गई है।

हालांकि इस विस्तार से भाजपा नेताओं में खासा असंतोष है। सरकार बनने के साथ ही शिवराज सिंह पर दबाव बनना शुरू हो गया था कि वे सिंधिया समर्थकों को उपकृत करने के बजाय अपनी पार्टी के ऐसे नेताओं को तरजीह दें, जो काम कर सकें। यह द्वंद्व केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा और काफी समय तक मंथन चलता रहा। आखिरकार शिवराज सिंह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अपना गणित समझाने में सफल रहे। दरअसल, हकीकत यह है कि सिंधिया समर्थकों के सहयोग के बिना शिवराज सिंह के लिए सरकार चलाना संभव नहीं है। उनकी नाराजगी सरकार का भविष्य अधर में डाल सकती है। इसलिए शिवराज सिंह किसी भी रूप में उनकी अनदेखी नहीं कर सकते। उधर सिंधिया समर्थकों की चिंता इस बात की है कि वे कांग्रेस के टिकट पर जीती अपनी सीट दांव पर लगा कर शिवराज सिंह के साथ आए हैं और उन्हें फिर उपचुनाव में उतरना है। उनकी बगावत और इस तरह पाला बदलने को लेकर काफी आलोचना हो चुकी है। ऐसे में वे अगर इस सरकार में उपेक्षित रह जाते, तो उनका भविष्य चौपट होने का खतरा था। फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया का मध्यप्रदेश में अपना दबदबा बनाने का सपना भी धरा रह जाता।

राजनीति और सत्ता के गणित में ऐसी उखाड़-पछाड़ चलती रहती है। मगर अब मंत्रिमंडल का गठन हो गया है और शिवराज सिंह सरकार से कामकाज की अपेक्षाएं हैं। इस कोरोना संकट के दौर में, जब मध्यप्रदेश खतरनाक स्थितियों से जूझ रहा है, बिना मंत्रियों के सरकार के लिए काम करना कठिन था। अब वह इस तरफ अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर सकेगी। मगर जिस तरह जोड़-तोड़ से सत्ता हथियाने और उसके बाद मंत्रिमंडल विस्तार तक पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में कामकाज की तरफ ध्यान कम और विजयोल्लास अधिक दिखाई दे रहा था, उससे कोई अच्छा संकेत नहीं मिलता। यहां तक कि मंत्रिमंडल विस्तार के दिन भी शपथग्रहण के समय खुद मंत्री और बाहर उनके समर्थक कोरोना संबंधी सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाते देखे गए। सरकार में जगह पा लेने का उछाह ठीक है, पर जिम्मेदार पदों का निर्वाह करने जा रहे लोग जब अपनी जवाबदेहियों को धता बताते नजर आते हैं, तो उनके आचरण पर सवाल उठते ही हैं। उम्मीद की जाती है कि अब वे संकट से जूझ रहे प्रदेश की बुनियादी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: दमन का कानून
2 संपादकीय: चुनौती का सामना
3 संपादकीय: हौसले की मिसाल
ये पढ़ा क्या...
X