आधुनिक दौर में जीवन की आपाधापी के बीच हर जगह प्रतिस्पर्धा, निजी स्वार्थ और व्यक्तिगत आजादी की चाह में पारिवारिक मूल्य का महत्त्व कम होता जा रहा है। बच्चों और अभिभावकों के बीच समझ एवं समन्वय तथा स्नेह और सम्मान की भावना से जुड़े धागे कमजोर पड़ने लगे हैं। कई बार तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि औलाद अपने माता-पिता को ही दुश्मन मान बैठती है और उनकी जान तक लेने को तैयार हो जाती है।
उत्तर प्रदेश में लखनऊ के आशियाना इलाके में एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई है, जहां एक बेटे ने अपने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी और उसके शव को टुकड़ों में काटकर एक हिस्से को ड्रम में छिपा दिया। हालांकि पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, मगर सवाल है कि किसी सामान्य परिवार के बच्चे में इस तरह की आपराधिक मानसिकता आ कहां से रही है?
क्या वजह है कि जिस समस्या को संवाद के जरिए आसानी से सुलझाया जा सकता है, वह इतनी जटिल हो जाती है कि संवेदनाएं सुन्न पड़ जाती हैं और आक्रामकता रिश्तों का भी खून कर देती है। इसमें दोराय नहीं कि आज बच्चों की परवरिश पर परिवार के अलावा डिजिटल जगत का प्रभाव भी साफ देखा जा रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुलभ उपलब्धता से बच्चों की ऐसी सामग्री तक पहुंच आसान हो गई है, जो उनके कोमल मन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हिंसा और अपराध से जुड़ी सामग्री बार-बार देखने-सुनने से बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना स्वाभाविक है। लखनऊ में हुई वारदात में प्रारंभिक जांच-पड़ताल के आधार पर पुलिस ने दावा किया है कि आरोपी का पिता उसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने का दबाव बना रहा था। इसको लेकर कई बार पिता-पुत्र की आपस में बहसबाजी भी हुई थी।
यह बात सही है कि माता-पिता को बच्चों पर अनावश्यक दबाव नहीं बनाना चाहिए, लेकिन वे अगर किसी बात पर जोर दे रहे हैं, तो उसके पीछे बच्चे की भलाई की इच्छा ही होती है। असहमति एक स्थिति हो सकती है, लेकिन देश और समाज को इस पर संजीदगी से विचार करने की जरूरत है कि बच्चों के भीतर ऐसी प्रवृत्ति कहां से आ रही है कि वे संवाद करने के बजाय हिंसक हो रहे हैं।
खंभे में जंग या सिस्टम में? राष्ट्रीय खिलाड़ी की मौत पर मानवाधिकार आयोग ने उठाए गंभीर सवाल | संपादकीय

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